शंकरजी एक नया दर्शन प्रदान करते हैं, वह यह है कि काम को तो भस्म कर दिया जाए, पर कामशून्य रति बनी रहे। रति भले ही अपने को अनाथ अनुभव करे, वह भले ही कहे कि महाराज! मेरे पति को आपने जला दिया और मुझे छोड़ दिया, आपने मेरे पति को जलाया, तो क्या उससे सारे लोक ही नहीं जल जायेंगे ? यदि सृष्टि में काम नहीं रहेगा तो लोक भला फिर कैसे रहेगा ? इस पर भगवान शंकर रति को सांत्वना देते हुए बोले- रति! अब तुम्हारा काम अशरीरी होगा और बाद में जब भगवान का अवतार श्रीकृष्ण के रूप में होगा, तब तुम्हारा पति उनके पुत्र के रूप में उत्पन्न होगा। तात्पर्य यह कि काम जब राम की सेवा में, भगवान की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दे और रति उनकी पुत्रवधू बनकर अपने को सौभाग्यशालिनी माने, तो यही जीवन की परिपूर्णता है।
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