हनुमानजी ने लंका की अशोक वाटिका में पहले बाग का फल खाया और बाद में उस बाग को उजाड़ दिया। यदि साधारण दृष्टि से देखें तो, तो यह बड़ा तर्क विरुद्ध कार्य लगता है। किसी वाटिका में फल खाने के बाद यह कौन सा शिष्टाचार है कि उस वाटिका को उजाड़ दिया जाए। रावण ने भी हनुमानजी से यही पूछा कि तुमने फल खाया तो खाया, पर बाग क्यों उजाड़ा? इसका एक गंभीर आध्यात्मिक तात्पर्य है। यह अशोकवाटिका क्या है? यह रावण की मोह की वाटिका है। मोह में भी मीठे फल होते हैं। गीता में अर्जुन के मन में अगर मोह उत्पन्न न होता, तो गीता जैसे फल की प्राप्ति ही न होती। रामायण में पार्वतीजी के अन्तःकरण में मोह हुआ, गरूड़ और भारद्वाज के मन में मोह हुआ, इसलिए यह रामकथा सुनने को मिली। तो हनुमानजी का अभिप्राय यह था कि मोह की वाटिका के मधुर फल तो ले लें, पर उसके बाद उस वाटिका को उजाड़ दें। यदि फल लेने के बाद मोह का नाश नहीं हुआ, तो वह अनर्थकारी होगा। गीता सुनने के बाद अर्जुन कहते हैं - नष्टो मोहः , मेरा मोह नष्ट हो गया।
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