लोभ के लिए गोस्वामीजी ने जो अपारा विशेषण लगाया, उसका एक विशिष्ट तात्पर्य है। काम और क्रोध इन दोनों दुर्गुणों का संबंध क्रमशः वर्तमान और भूतकाल से होता है। काम का स्वभाव है वर्तमानवादी होना। वर्तमान में कोई आकर्षण हुआ और अन्तःकरण में काम का संचार हो गया, पर क्रोध कब आता है ? कोई बात हो गयी तो क्रोध आता है कि ऐसा क्यों हुआ ? अतएव क्रोध भूतवादी है, पर यह जो लोभ है, वह भविष्यवादी है। इतना लोभ किसके लिए? बुढ़ापे के लिए। फिर बुढ़ापा नहीं, लड़के के लिए। लड़का ही नहीं पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए। अब वर्तमान और भूत तो ससीम हैं, पर भविष्य की कोई सीमा बाँधना कठिन है। इसलिए लोभ को अपार कहा।
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