Wednesday, 19 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

मेघनाद मूर्तिमान काम है। जब वह युद्ध करता है, तो तीन प्रकार की कला का उपयोग करता है। मेघनाद की पहली युद्धकला का तात्पर्य है इन्द्रियों में काम आना। उसकी दूसरी युद्धकला का अर्थ है कि इन्द्रियों के साथ-साथ मन में काम का घुस जाना, फलतः काम के साथ राग और द्वेष का युक्त हो जाना। यह पहले की अपेक्षा और भी कठिन स्थिति है। उसकी तीसरी युद्धकला है कि निकुम्भिला में यज्ञ करने चले जाना। यह मानो काम का बुद्धि में प्रविष्ट होना है। उसका अर्थ है काम की बौद्धिक स्वीकृति। इससे काम अजेय हो जाता है। काम को जीतने के लिए कम से कम बुद्धि से तो हमें यह लगना चाहिए कि राग-द्वेष अच्छी वस्तु नहीं है, इन्द्रियों में काम का होना बुरा है। यदि हम इन्द्रियों और मन में विकार के होते हुए भी बुद्धि के द्वारा उसका विरोध करेंगे, बुद्धि से उसे बुरा मानेंगे, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भले समय लगे, पर बुराई को हम जीत सकते हैं, काम को पराजित कर सकते हैं। किन्तु जब हम बुद्धि और तर्क के द्वारा काम का समर्थन करने लगते हैं और कहते हैं कि नहीं, काम तो जीवन के लिए सबसे उपयोगी वस्तु है, तब काम अजेय हो जाता है।

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