यह आपने सांकेतिक रूप में रामचरितमानस में पढ़ा होगा कि भगवान श्रीराम के चरित्रक्रम तीन यात्राएँ हैं और उनके सामने तीन नारी-पात्र आते हैं। जब उन्हें विश्वामित्र लेकर चले, तो ताड़का सामने आयी। जब वे वन को गये तो मंथरा इसमें हेतु बनी और उनके लंका पर आक्रमण करने में शू्र्पणखा कारण बनती है। ताड़का पर तो भगवान ने प्रहार किया, एक बाण से उसका वध कर दिया। मंथरा पर शत्रुध्न ने प्रहार किया और शू्र्पणखा पर लक्ष्मणजी ने। ये तीनों नारी-पात्र त्रेतायुग में इतिहास के पात्र के रूप में आते हैं। वस्तुतः व्यक्ति के अन्तःकरण में रहने वाली क्रोध, लोभ और काम की तीन वृत्तियाँ हैं - क्रोधमयी ताड़का, लोभमयी मंथरा और कामवासना से भरी हुई शू्र्पणखा। रामराज्य की स्थापना के लिए इन तीनों पर विजय की आवश्यकता है। चारों भाइयों में से तीनों भाइयों ने इन तीनों पर प्रहार करने का उत्तरदायित्व ग्रहण किया, पर बचे हुए श्री भरत की इसमें कोई भूमिका नहीं दिखाई दे रही है, वे किसी प्रकार का प्रहार करते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं। तो क्या उनकी भूमिका ही नहीं है ? नहीं ! ऐसी बात नहीं, उनकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है और वह है चिकित्सक की भूमिका। जहाँ अन्य तीनों भाई प्रहार की भूमिका का निर्वाह करते दिखाई देते हैं, वहाँ श्री भरत चिकित्सक के रूप में तीनों वृत्तियों की चिकित्सा करते हुए दिखाई देते हैं।
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