दोषों के संबंध में गोस्वामीजी से पूछा गया कि व्यक्ति चेष्टा करके भी इन दोषों को क्यों दूर नहीं कर पाता है ? इसका उत्तर देते हुए वे विनय पत्रिका में कहते हैं कि मनुष्य के मन में जो दोष हैं, उनसे संबंध इसी जन्म से न होकर पूर्व-पूर्व जन्मों से है। वे लिखते हैं - अनेक जन्मों से यह चित्त पाप में लगे रहने का अभ्यासी है, इसलिए उसमें दोष अधिकाधिक लिपटते ही जाते हैं ? यह चित्त क्या है ? वह अन्तःकरण चतुष्टय का एक अंग है और उसके शेष तीन अंग हैं मन, बुद्धि और अहंकार। चित्त संस्कारों का पुंज है और उसमें दोष और गुण की सत्ता समान रूप से विद्यमान है। चित्त के ये दोष मन के धरातल पर सक्रिय होकर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं। इस प्रकार चित्त और मन दोनों दोषयुक्त हो जाते हैं। चित्त से दोष का उद्भव होता है और मन से वह जीवन में क्रियान्वित होने लगता है। अब यदि उस दोष में मनुष्य की बुद्धि गुण देखने लगे तो फलस्वरूप वह व्यक्ति अहंकारी हुए बिना नहीं रहेगा। सामान्यतः मनुष्य का जीवन दो भागों में बँटा होता है - एक भाग में चित्त और मन और दूसरे भाग में बुद्धि और अहं, पर जब बुद्धि और अहं चित्त और मन के रंग में रंग जाते हैं, तब हमारा समूचा अन्तःकरण चतुष्टय दोषयुक्त हो जाता है। फलतः रोग असाध्य हो जाता है।
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