Monday, 24 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामायण में विश्वास के दो पक्ष दिखाये गये है। एक पक्ष में कहा गया है कि ईश्वर में एवं संत में विश्वास होना परम कल्याणकारी है, पर उसके साथ ही दूसरे पक्ष के रूप में ऐसे भी पात्र बताये गये हैं, जहाँ विश्वास बड़ा घातक सिद्ध हुआ। केवल विश्वास होना अपने आप में गुणकारी नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है कि चाहे जहाँ विश्वास कर लिया। रावण पर सीताजी ने विश्वास किया। प्रतापभानु ने कपटमुनि पर विश्वास किया। तो इन लोगों का विश्वास साधक सिद्ध हुआ कि घातक ? तात्पर्य यह है कि जहाँ पर हम बिना विचार के अपना विश्वास स्थापित कर देते हैं, वहाँ हमारे लिए विश्वास घातक सिद्ध होता है।

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