लोभ की अनिवार्यता, तत्पश्चात उसका अतिरेक और अतिरेक से उत्पन्न होने वाले परिणाम का पहला चित्र प्राप्त होता है रामचरितमानस के प्रारंभ में। मानस को पढ़ने पर कुछ ऐसा लग सकता है कि उसमें इतिहास-पक्ष की अवहेलना सी है। यदि कोई उसमें रावण के माता-पिता का नाम जानना चाहे, तो उसे निराश होना पड़ेगा। इतिहास के स्थान पर एक दूसरी पध्दति को इस ग्रंथ का आधार बनाया गया है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्म से है। इस दूसरी पध्दति में यह नहीं कहते कि विश्रवा मुनि और कैकसी के द्वारा रावण का जन्म हुआ, बल्कि यह बतलाते हैं कि रावणत्व का जन्म कैसे होता है ? महत्व इसका नहीं है कि रावण इस जन्म में किसका बेटा था ? महत्व इसका है कि रावण पूर्वजन्म में क्या था ? रावण की पूर्वजन्म की जो गाथाएँ हैं, उनमें यह बतलाया गया है कि रावण पूर्वजन्म में बुरा नहीं था, पर अगले जन्म में वह बुरा हो जाता है। एक अच्छा व्यक्ति किन परिस्थितियों में बुरा बन जाता है, इसका एक क्रमिक विश्लेषण रावण के पुनर्जन्म की गाथा के माध्यम से रामचरितमानस में प्रस्तुत किया गया है। रामायण में रावण के चार रूपों की भी चर्चा की गयी है, जिसे चार-कल्पों की कथा के नाम जाना जाता है। एक कल्प में भगवान शंकर के गण अन्त में रावण और कुम्भकर्ण बन जाते हैं। दूसरे कल्प में भगवान विष्णु के पार्षद जय और विजय रावण और कुम्भकर्ण के रूप में परिणत हो जाते हैं। तीसरे कल्प की गाथा यह है कि प्रतापभानु नाम का राजा रावण के रूप में जन्म लेता है। इन पात्रों में से एक जब रावण के रूप में जन्म लेता है, तो उसके मूल में लोभ की वृत्ति है। यदि लोभ अतिशय न होता, उसकी पराकाष्ठा न होती, तो एक श्रेष्ठ व्यक्ति रावण के रूप में परिणत न हुआ होता।
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