Monday, 17 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

रामचरितमानस में मन के दोषों का वर्णन करते हुए बतलाया गया कि भले ही हमारे मन में दोष विद्यमान है, पर यदि बुद्धि में यह बोध बना रहे कि मेरे मन में दोष है, यदि हम दोष को दोष के रूप में देखते रहें और बुद्धि के द्वारा उनका समर्थन न करें, तो इन दोषों को दूर किया जा सकता है।

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