Saturday, 8 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

हनुमानजी रावण के बगीचे को उजाड़कर मानो मोह के बाग के रक्षक दुर्गुण, दुर्विचार रूपी राक्षसों को चुनौती देते हैं। जिस व्यक्ति ने भक्ति की कृपा से मोह का मधुर रस पा लिया है, तथा मोह के माध्यम से भी जिसके जीवन में भक्तिरस की वृद्धि हुई है, वह दुर्गुणों के विरुद्ध लड़ने से घबराता नहीं। उसे कोई भय नहीं होता। हनुमानजी सारी वाटिका को ध्वंस करते हुए राक्षसों पर जो प्रहार करते हैं, वह मानो दुर्गुण-दुर्विचारों पर प्रहार करते हैं। जब यह सूचना रावण के पास पहुँचती है, तो वह पहले अक्षय को भेजता है और बाद में मेघनाद को। रावण के पुत्र मेघनाद और अक्षयकुमार काम और लोभ के प्रतीक हैं। हनुमानजी के चरित्र में लोभ का कोई लेश नहीं था। अक्षय उसी को जीत सकता है, जिसके जीवन में कोई लोभ हो। हनुमानजी ने स्वयं अपने पास कुछ न रखकर सबको दिलाने का ही कार्य करते हैं। हनुमानजी की निर्लोभ वृत्ति का ही प्रमाण है कि उन्होंने स्वर्णमयी लंका को जलाकर नष्ट कर दिया। इसलिए उन्हें लोभ के प्रतीक अक्षयकुमार को उसके अपार सैनिकों सहित मारने में तनिक भी विलंब नहीं लगा।

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