Tuesday, 11 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

शंकरजी के प्रसंग में भी जब काम उन पर आक्रमण करने के लिए आता है - वह तुरंत सुन्दर ऋतुराज बसन्त को प्रकट करता है, बसन्त में आम का वृक्ष व्यक्ति को बड़ा प्रिय लगता है। आम का फल भला किसे प्यारा नहीं लगता ? आम के बौर की सुगंध किसे आकृष्ट नहीं करती ? और उस आम के वृक्ष पर काम आ जाता है तथा वहीं से वह शंकरजी पर आक्रमण करता है।  फलस्वरूप भगवान शंकर ने काम को तो जलाया, पर जिस आम के वृक्ष पर वह बैठा था, उसे नहीं जलाया अर्थात उन्होंने बसन्त को नहीं जलाया। सांकेतिक भाषा यह है कि उन्होंने काम को आधा जलाया और आधा छोड़ दिया अर्थात काम को तो जला दिया, पर उसकी पत्नी रति को छोड़ दिया। बस, वही काम का शुद्ध उपयोग है, जिसे भगवान शंकर अपनी प्रक्रिया से साधित करते हैं। नारी बसन्त ऋतु के समान है, बसन्त को नहीं मिटाना है, रति को नहीं मिटाना है। केवल काम को ही भस्म के रूप में परिणत करना है, जिससे उसके अमंगलकारी तत्व नष्ट हो जाएँ। नारी का एक रूप वह है, जहाँ वह बसन्त के रूप में काम की संगिनि हो वासना का संचार करती है, पर उसका एक दूसरा रूप भी है, जहाँ वह श्रद्धा के रूप में संत सभारूपी अमराई को विकसित करने हमारे जीवन में आती है। गोस्वामीजी लिखते हैं - संतों की सभा चारों ओर की अमराई है और श्रद्धा बसन्त ऋतु के समान कही गयी है। जब वासना का बसन्त अन्तःकरण में आता है, तब मनुष्य कामोन्मुख होता है। और श्रद्धा का बसन्त आने पर वह सत्संगी बनता है, संतों की सभा के प्रति उसकी रुझान बढ़ती है।

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