Tuesday, 4 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

जब काम जीवन में नियंत्रित और मर्यादित रहता है तब हानिकारक नहीं होता, पर जब वह मर्यादा की सीमा लाँघ जाता है तब व्यक्ति और समाज को पतन की ओर ले जाता है। इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए रामचरितमानस के भिन्न-भिन्न प्रसंगों में काम के विविध पक्षों का सुन्दर विश्लेषण किया गया है और यह बताया गया है कि किस रूप में उसे समाज में स्वीकार किया जाना चाहिए तथा किस रूप में उसका परित्याग होना चाहिए। एक ओर तो वह काम है, जो ब्रह्मा और देवताओं की प्रेरणा से भगवान शंकर पर आक्रमण करने आता है तथा दूसरा काम वह है, जो लंका में मेघनाद के रूप में रहता है तथा रावण की प्रेरणा से बंदरों के विरुद्ध, भगवान राम और लक्ष्मण के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रस्तुत होता है। अब यहाँ देखना होगा कि प्रथम और द्वितीय काम की प्रक्रिया में क्या अंतर है ?

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