Sunday, 23 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

रामायण में दो मृगों का एक सांकेतिक प्रसंग आया है। रावण सीताजी को ठगने के लिए सुनहरा मृग ले आया था और वह स्वयं चाँदी के दाँतों वाले मृग से ठगा गया, क्योंकि आखिर प्रतापभानु ही तो रावण बना न ! यह बुराई का मनोविज्ञान है। व्यक्ति एक बार जब किसी से ठगा जाता है तो दूसरे को ठगने के लिए उसी कला का प्रयोग करता है। कहीं किसी को नोट भुनाने में नकली नोट मिल गयी।  अब होना तो यह चाहिए था कि जब व्यक्ति को मालूम पड़ गया कि नोट नकली है, तो वह उसे फेंक देता, पर ऐसा होता नहीं। मनुष्य में स्वार्थवृत्ति आ जाती है और वह सोचता है कि मैंने जब धोखा खाया, तो मैं क्यों घाटे में रहूँ और वह उस नकली नोट को चलाने की ताक में रहता है। किसी के द्वारा हम ठगे जाते हैं तो हम दूसरे तो ठगते हैं और वह तीसरे को ठगता है। इस प्रकार से बुराई का चक्र प्रारंभ होता है। लेकिन इस लोभ-मृग के प्रति आकर्षण कभी खत्म नहीं होता।

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