अलग-अलग विकारों के केन्द्र अलग-अलग हैं। काम को नारी-सौन्दर्य का बल है और क्रोध को कठोर वाणी का। लोभ के लिए बल का केन्द्र है - इच्छा और दम्भ। प्रतापभानु के जीवन में सबसे पहले राज्य की इच्छा हुई। इसका अर्थ यह है कि पिता की राज्यसत्ता में बने रहते हुए भी मैं राजा बनूँ ऐसी इच्छा प्रतापभानु के मन में विद्यमान थी और ज्यों ही पिता ने कहा कि तुम इस राज्य का संचालन करो, उसने अपनी इच्छा की पूर्ति का अवसर प्राप्त कर उसे स्वीकार कर लिया। अपनी इच्छा को यह कहकर उसने अपनी बुद्धि का समर्थन दे दिया कि मैं पिताजी के आदेश से राज्य ले रहा हूँ, वस्तुतः मुझमें राज्य लेने की कोई इच्छा नहीं है। गोस्वामीजी कहते हैं कि राजा होने के बाद वह चतुरंगिणी सेना सजाता है तथा राजाओं के राज्य पर आक्रमण करता है। यही इच्छा का विस्तार है। उसे लगता है कि मेरी योग्यता तो इस राज्य को बढ़ाने में है और बढ़ाने का उपाय यह है कि अपने भाग पर तो अधिकार कर ही लें, दूसरे के भाग को भी छीनने की चेष्टा करें और यह केवल प्रतापभानु का ही मनोभाव नहीं है, यह लिप्सा की प्रवृत्ति हम सबमें रुढ़ है। हम समझते हैं कि जब तक दूसरों की समृद्धि के भाग को छीनकर हम उसके स्वामी नहीं बन जाते, तब तक हमारी योग्यता कुछ दिखती नहीं।
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