काम के पश्चात गोस्वामीजी मन के दूसरे दोष को लेते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्ति के मन का लोभ ही कफ है। जैसे व्यक्ति के शरीर में कफ की अवस्थिति अनिवार्य है, वैसे ही उसके तथा समाज के जीवन में भी लोभ की अनिवार्यता है। व्यक्ति जब कोई कार्य करता है, तो प्रारंभ में परिणाम की आकांक्षा उसके मन में होती ही है, लेकिन ध्यान रहे कि वह अपार न होने पाये। जिस समय कफ शरीर में सहज स्वभाव से स्थित रहता है, उस समय वह हानिकारक नहीं होता, अपितु शरीर की शक्ति की वृद्धि में सहायक ही होता है, लेकिन वही कफ बढ़ता हुआ यदि श्वास नली को जकड़ ले, ह्रदय को जकड़ ले, तब तो ऐसे स्थिति में वह कफ व्यक्ति को शक्ति देने के बदले उसके लिए मृत्यु का संदेश लेकर आता है। तब व्यक्ति को ऐसा लगता है कि जब तक हमारे ह्रदय में छाया हुआ कफ किसी तरह से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक वह विनष्ट नहीं होगा, तब तक हमें शांति नहीं मिलेगी। लोभ की प्रवृत्ति का स्वरूप भी यही है। जब लोभ की प्रवृत्ति के साथ उसकी अपारता आ जाती है। तब वह घातक सिद्ध होता है।
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