रामचरितमानस में रामकथा के समापन के बाद गरूड़जी ने काकभुशुण्डिजी से कहा - कृपया आप मेरे सात प्रश्नों का समाधान दें। ये सातों प्रश्न हम सबके जीवन से जुड़े हुए हैं। जो समस्याएँ हमारे सामने आती हैं, इन सातों प्रश्नों में उनका अन्तर्भाव है। उनमें अंतिम प्रश्न यह था कि लोग इतने दुखी क्यों हैं ? अशांत क्यों हैं ? इसके उत्तर में काकभुशुण्डिजी ने कहा कि व्यक्ति की अस्वस्थता ही उसे दुखी और अशांत बना देती है और वह अस्वस्थता दो प्रकार की होती है - शारीरिक और मानसिक। अब कुछ मनुष्य शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ हो सकते हैं, पर ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा, जो मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ न हो। यहाँ तक कि क्षीरसागर में भगवान के सान्निध्य में रहने वाले गरूड़जी भी स्वयं अस्वस्थ हो जाते हैं, जिसकी चिकित्सा के लिए उन्हें चारों ओर वैद्य की खोज करनी पड़ती है। तो, वे भुसुण्डिजी से यह जानना चाहते हैं कि व्यक्ति या समाज के जीवन में ये मनोरोग कैसे पैदा होते हैं ? इनका स्वरूप क्या है तथा इन रोगों को मिटाने की कोई अमोघ दवा है अथवा नहीं ? इस पर काकभुशुण्डिजी ने वैद्य, औषधि और पथ्य आदि की व्यवस्था तो बतलायी, पर साथ ही यह भी कहा कि जो सबसे प्रारंभिक बात है वह यह है कि व्यक्ति को रोग का सही-सही ज्ञान हो जाय। तब गरूड़जी ने पूछा- क्या रोगों का ज्ञान हो जाने मात्र से व्यक्ति रोग से मुक्त हो सकता है ? भुसुण्डिजी बोले - नहीं, उससे रोग पूरी तरह से तो मुक्त नहीं हो सकता, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि जब व्यक्ति अपने रोग को जान लेता है, तब उसके रोग की शक्ति, उसकी क्षमता कम हो जाती है।
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