कामी की वृत्ति शिथिल पड़ जाती है, क्रोध शांत हो जाता है, पर लोभ की वृत्ति निरंतर वर्धमान है। तभी तो गोस्वामीजी ने भगवान से जो वरदान माँगा, उन्होंने कहा - कामिहि नारि पियारि जिमि। लोभिहि प्रिय जिमि दाम। - महाराज कामी का नारी के प्रति जो आकर्षण होता है, मेरा आपके प्रति वैसा ही प्रेम हो। साथ ही लोभी को जैसे धन प्यारा है, आप मुझे वैसे ही प्यारे लगें। मन में प्रश्न जगता है कि कामिहि नारि पियारि के बाद लोभिहि प्रिय जिमि दाम क्यों जोड़ा गया ? गोस्वामीजी को लगा कि कामी में पाने की तो तीव्र उत्कण्ठा होती है, पर उपलब्धि के बाद उसके अन्तःकरण में उतना आकर्षण और उत्साह नहीं रह जाता। तो कहीं भगवान को पाने के बाद उनके प्रति मेरे मन में वैसी ही न्यूनता न आ जाय, इसलिए वे बोले, प्रभो! जब तक आप मुझे नहीं मिले हैं, तब तक कामी जैसा रहूँ और जब आप मिल जायँ, तो लोभी हो जाऊँ। लोभी ही ऐसा है, जिसे प्राप्ति के पश्चात कभी भी ऐसा नहीं प्रतीत होता कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।
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