जय और विजय जब रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लेते हैं, तब उसके मूल में अहंकार की प्रधानता है। पर जब प्रतापभानु रावण बनता है, तब उसके मूल में लोभ की मुख्यता है। इसके सांकेतिक तात्पर्य यह है कि गोस्वामीजी मानो व्यक्ति की सावधान कर देना चाहते हैं कि वह यह सोचकर निश्चिन्त न हो जाय कि रावण एक बुरा व्यक्ति था, बल्कि यह जान ले कि रावणत्व किन परिस्थितियों में जन्म लेता है और यदि उसी प्रकार की मनःस्थिति और परिस्थिति हमारे जीवन में आती है, तो हम भी रावण बन सकते हैं। इसी प्रकार रुद्रगणों की गाथा के माध्यम से यह बतलाया गया है कि परदोष-दर्शन से भी रावणत्व का जन्म होता है तथा वृन्दा की गाथा यह प्रदर्शित करती है कि जब व्यक्ति धर्म से प्राप्त शक्ति को अधर्म के संरक्षण में लगाता है, तो उससे भी रावणत्व पैदा होता है। वृन्दा पतिव्रता थी और उसने अपने पतिव्रत से प्राप्त शक्ति के द्वारा अपने दुराचारी पति की रक्षा करनी चाही। वह तो हुआ नहीं, पर उसके पति जालन्धर को रावण के रूप में जन्म लेना पड़ा। इस प्रकार से यह चारों कल्पों की गाथा है।
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