कहा जाता है कि काम का सेनापति है बसन्त। एक प्रसिद्ध श्लोक प्रचलित है कि वैद्यों के एक माता-पिता वे हैं जिनसे वे जन्म लेते हैं, और वैद्यों की दूसरी माता है शरद ऋतु तथा पिता हैं बसन्त। संकेत यह है कि सबसे अधिक लोग या तो शरद ऋतु में अस्वस्थ होते हैं या फिर बसन्त ऋतु से। इसलिए वैद्य लोग इन दोनों को धन्यवाद देते हैं कि आप रोगियों को हमारे पास भेजकर हमारी रक्षा करते हैं। फिर, उसका मनोवैज्ञानिक तात्पर्य यह है कि वैसे तो गर्मी में भीषण गर्मी पड़ती है और शीत में भीषण ठण्ड, पर शरद और बसन्त, ये दोनों ऋतुएँ बड़ी सुहावनी लगती हैं। तब व्यक्ति रोगी क्यों होता है ? इसलिए कि ग्रीष्म और शीत ऋतुओं में तो व्यक्ति सावधान रहता है, पर सुहावनी ऋतु आती है तो असावधान हो जाता है, इसलिए वह रोग का शिकार हो जाता है। यही स्थिति काम के संदर्भ में भी है। जिन दुर्गुणों को हम दुर्गुणों के रूप में पहचानते हैं, उनसे लड़ने के लिए तो हम सावधान रहते हैं, पर जिसका संस्पर्श हमें सुहावना लगता है, वह हममें ऐसी प्रतीति जगाता है कि वह आक्रमण करने कहाँ आ रहा है ? वह तो हमारा स्वागत करने आया हुआ है। इसलिए बसन्त को काम का सखा कहा गया है।
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