गोस्वामीजी लिखते हैं कि मन के ये जो पापी रोग हैं, दुर्गुण हैं, इनकी विलक्षणता यह है कि जानने से वे क्षीण हो जाते हैं, पर हाँ ! वे पूरी तरह से नाश को नहीं प्राप्त होते हैं। जैसे शारीरिक रोग के संदर्भ में यदि व्यक्ति को ज्ञात न हो कि वह अस्वस्थ है, तो परिणाम यह होता है कि भीतर ही भीतर उसका रोग बढ़ता रहता है। किन्तु यदि उसे मालूम हो जाता है कि उसके शरीर में किसी प्रकार का रोग हुआ है, तो वह भोजन में, व्यवहार में सतत सावधान रहता है और वैद्य डाँ. आदि की खोज में लगा रहता है। शारीरिक रोगों के संदर्भ का यह सत्य मानसिक रोगों के संदर्भ में और भी अधिक सत्य है। मानस-रोगों का जो संस्कार है, उनका जो मूल उद्भव है, वह मात्र इस जन्म का नहीं है, अपितु पूर्वजन्मों से चित्त के संस्कार के साथ जुड़ा हुआ है। गोस्वामीजी विनयपत्रिका में कहते हैं - जनम जनम अभ्यास निरत चित, अधिक अधिक लपटाई। - अनेक जन्मों से यह मन पाप में लगे रहने का अभ्यासी हो रहा है, इसलिए यह पाप रूपी मल अधिकाधिक लिपटता ही चला जाता है।
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