जीवन में कभी ऐसे विचित्र अवसर आते हैं, जब धर्म का स्वरूप समझना कठिन हो जाता है। एक उदाहरण कर्ण का है। जब वह युद्ध कर रहा था, उस समय उसके रथ का पहिया जमीन में धँस गया। जब वह रथ से उतरकर पहिया निकालने लगा, तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा - बस इसी समय इसे मारो। नहीं तो यह नहीं मरेगा। अर्जुन थोड़ा हिचकिचाता है कि जब कोई व्यक्ति निहत्था होकर अपने रथ का पहिया निकाल रहा हो, तब क्षात्रधर्म के अनुसार उस पर प्रहार कैसे किया जाय ? कर्ण को देखें तो वह धर्म के रथ पर आरूढ़ है। धर्मरथ में जितने गुण बतलाये गये हैं, उनमें से अधिकांश कर्ण के जीवन में दिखाई देते हैं। पर कर्ण का दुर्भाग्य यह है कि ऐसे धर्मरथ पर बैठकर भी वह अधर्म को जिताने के लिए युद्ध कर रहा है। भगवान कृष्ण का तात्पर्य यह है कि जिस समय कर्ण धर्मरथ से उतरा हुआ है, उसी समय उस पर प्रहार करना चाहिए, वही उसे मारने का उचित अवसर है। यदि तुम उसे इस प्रकार धर्म के द्वारा अधर्म को शक्ति प्रदान करने दोगे, तब तो तुम अधर्म को मार ही नहीं पाओगे। इसलिए अभी, इसी समय तुम कर्ण को मारे।
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