Friday, 21 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामचरितमानस में यह संकेत दिया गया है कि भोग और त्याग दोनों धर्म के रूप में व्यक्ति के सामने आते हैं। यदि भोग को व्यक्ति बाध्यता समझकर अपने मन की दुर्बलता समझकर भोगता है, तो वह बच जायेगा, पर यदि वह भोग को बौद्धिक समर्थन देता हुआ भोगता है, तो उसमें लिप्त हो जायेगा और डूब मरेगा। यह विश्लेषण केवल इतना संकेत देने के लिए था कि मनु के पुत्र ने पिता की आज्ञा होते हुए भी राज्य को स्वीकार करने में हिचकिचाहट दिखलायी और उनमें राज्यलिप्सा का अभाव था, इसलिए उसने बाध्यता में राज्यसत्ता स्वीकार की, परन्तु प्रतापभानु में अधिकार - लिप्सा थी, लोभ था, इसलिए उसने राज्यसत्ता स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं की, उलटे उसे अपना प्राप्तव्य मानकर स्वीकार किया। प्रतापभानु का यह लोभरूप कफ ही उसके विनाश का कारण होता है और उसे अंत में रावण बना देता है।

No comments:

Post a Comment