काम जिस पर आक्रमण करता था, उसे अंधा बनाता था। केवल शंकरजी ही थे, जो उसके आक्रमण के बाद अंधे नहीं बने, बल्कि उनकी आँखें और भी पैनी हो गयीं और वे पैनी आँखों से देखने लगे कि उनके अंतर्मन में क्षोभ किसने पैदा किया ? उन्होंने नेत्र खोला और देखा- अच्छा, यह काम है, जो मेरे मन में वासना की सृष्टि करना चाहता है। देवता डर के मारे सोचने लगे कि कहीं शंकरजी अपना तीसरा नेत्र न खोल दें, पर शंकरजी ने तो तीसरा नेत्र खोलने का संकल्प कर लिया था, क्योंकि वही असली और नकली की पहचान की कसौटी थी। राम और काम दोनों ही देखने में एक जैसे सुन्दर हैं, एक जैसे धनुर्धारी हैं। भगवान राम के विवाह के समय भी भगवान शंकर ने अपना तीसरा नेत्र खोला था और यहाँ पर भी उसी को खोलने का निश्चय करते हैं। उनका तात्पर्य है कि जो मेरी तीसरी आँख के सामने ज्यों का त्यों रहे, वह राम है और जो जलकर खाक हो जाय, वह काम है। तब शंकरजी ने तीसरा नेत्र खोला। उनके देखते ही काम जलकर भस्म हो गया। तात्पर्य यह है कि उन्होंने विष से विष की दवा की, काम को क्रोध से नष्ट कर दिया। उनका अभिप्राय यह है कि क्षमाशील बनिए! पर बुराई के प्रति क्षमाशील बनना उचित नहीं है। बुराई पर जितना क्रोध कर सकें उतना करें और उसे मिटाने का प्रयास करें, तभी बुराई से रक्षा हो सकती है।
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