विवाह का निर्णय दो पात्रों में दो अलग-अलग प्रकार की प्रक्रिया उत्पन्न करता है। नारदजी ने भी विवाह की योजना बनायी और उसकी प्रक्रिया के रूप में उनका मन अत्यंत चंचल हो गया, सोचने लगे - इस समय जप-तप से तो कुछ बो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी ? पर यहाँ जब शंकरजी ने विवाह का निर्णय लिया तो वे पार्वतीजी के चिंतन में नहीं डूबे, अपितु सुजान शंकरजी मन को स्थिर करके श्रीराम के ध्यान में डूब गये, पर स्वार्थियों का दल शंकरजी को ध्यान में डूबते देख धैर्य खोने लगा। जो स्वार्थी होता है, वह व्यक्ति को दूध के बदले शराब पिलाने की सोचता है कि दूध से जल्दी काम नहीं बनेगा, उससे स्फूर्ति और शक्ति मिलने में तो कई दिन लगेंगे, जबकि शराब पिलाकर व्यक्ति से तुरन्त मनमाना काम लिया जा सकता है।
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