सेतुबन्ध में दूसरी ओर जलचरों के साथ समस्या यह है कि ये मनुष्य को खा जानेवाले हैं । जीवन के दुर्गुण-विचार ही ये जलचर हैं । लक्ष्मणजी ने कहा था, प्रभो, आप समुद्र को सुखा दीजिए । यदि समुद्र सूख जाता तो उसके सारे जलचर भी मर जाते, पर समुद्र ने भगवान से कहा कि प्रभो ! इसमें कोई संदेह नहीं कि लक्ष्मणजी जैसे महापुरुष दुर्गुणों को क्षणभर में जलाकर नष्ट कर सकते हैं, परन्तु आप तो सब पर कृपा करने हेतु आये हुए हैं; तो क्या इन दुर्गुणों का भी सदुपयोग नहीं करेंगे ? और सचमुच भगवान इन दुर्गुणों का भी कितना सार्थक उपयोग करते हैं । अन्त में जब भगवान उस सेतुबन्ध पर खड़े हुए, तो समुद्र से निकले हुए जलचर भगवान का सौन्दर्य देखने लगे । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि सद्गुणों को जोड़िये और दुर्गुणों को ईश्वर की ओर मोड़िये । हमारे जीवन में राग है । ये राग मानो जलचर हैं । इन्हें प्रभु की ओर मोड़ देना चाहिए ।
Sunday, 31 December 2017
Saturday, 30 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
.....कल का शेष ....
सद्गुणों के संदर्भ में हमारे जीवन में दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की और दूसरी समस्या आती है, न जुड़ पाने की । सद्गुण है तो अभिमान अवश्य दिखाई देता है और फिर एक सद्गुण आता है, तो दूसरा सद्गुण दूर भागता है । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? नल-नील को उपाय प्राप्त था कि उनके स्पर्श से पत्थर हल्के हो जाएँगे । सद्गुणों से अभिमान मिटाना हो तो सन्तों की कृपा प्राप्त कीजिए, सन्तों का आर्शीवाद प्राप्त कीजिए । सत्संग में जाएँगे, अभिमान की निन्दा सुनेंगे तो सद्गुणों में जो 'मैं' जुड़ा हुआ है, वह 'मैं' दूर होगा । परन्तु हल्के होने के बाद भी एक गुण दूसरे गुण के समीप कैसे आएँगे, आपस में जुड़ेंगे कैसे ? इसके लिए कहा गया कि सन्तों की कृपा के साथ-साथ, जब तक भगवन्नाम का आश्रय न लिया जाए, तब तक ये जुड़ेंगे नहीं । भगवन्नाम ही सद्गुणों को जोड़ता है । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि यदि हम देहाभिमान के समुद्र को पार करना चाहते हैं, तो सत्संग के साथ-ही-साथ भगवन्नाम का जप करें । इन दोनों के माध्यम से साधना का एक ऐसा सेतु बनेगा, जिसके द्वारा हम देहाभिमान को पार करके भक्तिरूपा सीताजी का साक्षात्कार कर सकते हैं ।
सद्गुणों के संदर्भ में हमारे जीवन में दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की और दूसरी समस्या आती है, न जुड़ पाने की । सद्गुण है तो अभिमान अवश्य दिखाई देता है और फिर एक सद्गुण आता है, तो दूसरा सद्गुण दूर भागता है । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? नल-नील को उपाय प्राप्त था कि उनके स्पर्श से पत्थर हल्के हो जाएँगे । सद्गुणों से अभिमान मिटाना हो तो सन्तों की कृपा प्राप्त कीजिए, सन्तों का आर्शीवाद प्राप्त कीजिए । सत्संग में जाएँगे, अभिमान की निन्दा सुनेंगे तो सद्गुणों में जो 'मैं' जुड़ा हुआ है, वह 'मैं' दूर होगा । परन्तु हल्के होने के बाद भी एक गुण दूसरे गुण के समीप कैसे आएँगे, आपस में जुड़ेंगे कैसे ? इसके लिए कहा गया कि सन्तों की कृपा के साथ-साथ, जब तक भगवन्नाम का आश्रय न लिया जाए, तब तक ये जुड़ेंगे नहीं । भगवन्नाम ही सद्गुणों को जोड़ता है । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि यदि हम देहाभिमान के समुद्र को पार करना चाहते हैं, तो सत्संग के साथ-ही-साथ भगवन्नाम का जप करें । इन दोनों के माध्यम से साधना का एक ऐसा सेतु बनेगा, जिसके द्वारा हम देहाभिमान को पार करके भक्तिरूपा सीताजी का साक्षात्कार कर सकते हैं ।
Friday, 29 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
सेतुबन्ध में पहले पत्थर का पुल बनाया । यह सद्गुणों के द्वारा बनाया जाने वाला पुल है । यहाँ सद्गुणों के साथ जो समस्या है, वह सेतुबन्ध के सामने भी आई । पत्थर में दृढ़ता तो खूब है, पर वे उतने ही अधिक भारी भी हैं । जल में डालते ही डूब जाते हैं और केवल स्वयं ही नहीं बल्कि अपने साथ बँधने वाले को भी डुबा देते हैं । सद्गुण के साथ दो समस्याएँ थी । एक तो ये हल्के कैसे हों और दूसरी कि ये जुड़ें कैसे ? नल-नील ने छू दिया तो हल्के हो गए, पर जब उन्हें जल में डाला गया तो वे तरंगों के कारण एक-दूसरे से अलग हो गए । अब जब जोड़ने की बात आई तो हनुमानजी आगे आए । वे बोले कि एक पत्थर पर *रा* लिखो और दूसरे पर *म*, बस पत्थर जुड़ जाएँगे । ऐसा ही किया गया, पत्थर जुड़ गए और इस प्रकार निर्मित पुल से होकर बन्दरों ने समुद्र पार किया । सद्गुणों के संदर्भ में इसका अभिप्राय यह है कि हमारे जीवन में सद्गुणों के साथ दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की ।
....शेष कल ....
....शेष कल ....
Thursday, 28 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
साधना की दृष्टि से सेतुबन्ध का बड़ा गहरा तात्विक अर्थ है । इसमें भी आप साधना के क्रमिक विकास का क्रम पाएँगे । सेतु दो तरह से बनाया गया । कुछ भाग तो पत्थरों से बनाया गया और कुछ भाग जलचरों से भी । इसे सांकेतिक रूप से कहें तो पत्थर सद्गुण हैं और जलचर दुर्गुण । समुद्र पर सेतु-निर्माण का अर्थ है कि मनुष्य जीवन में सद्गुणों का सदुपयोग कैसे करें ? पर सेतुबन्ध में इससे भी अधिक कठिन भूमिका प्रस्तुत की गई कि क्या दुर्गुणों का भी सदुपयोग हो सकता है ?
Wednesday, 27 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
यदि कोई नदी हो और घोषणा कर दी जाए कि अमुक योगी नदी को आकाशमार्ग से पार करेंगे, तो लाखों आदमी उसे देखने को उमड़ पड़ेंगे और बड़ी श्रद्धा से उनकी पूजा-वन्दना करने लगेंगे । लेकिन इससे हमारी समस्या का समाधान तो नहीं हुआ । दूसरे दिन जब हमें नदी पार करनी होगी, तो हमारे सामने फिर वही समस्या आएगी । योगियों का दर्शन तो हो गया, पर हम स्वयं नदी कैसे पार करें ? इसलिए सरल पद्धति तो यही है कि जिनमें क्षमता है, वे यदि सेतु का निर्माण कर दें, तो फिर छोटे-से-छोटा व्यक्ति और इतना ही नहीं, पशुओं को भी पार जाने की सुविधा हो जाती है । गोस्वामीजी कहते हैं कि बेचारी चींटी तो कभी नदी कर पाने की कल्पना ही नहीं कर सकती, पर पुल बन जाने पर इतनी सुविधा हो गई कि चींटी भी बड़ी सरलता से इस पार से उस पार चली गई । अतः साधना का ऐसा रूप होना चाहिए कि जिसमें बड़े-से-बड़े व्यक्ति से लेकर छोटे-से-छोटे व्यक्ति भी उसी सत्य का साक्षात्कार कर सकें । यही सेतु का वास्तविक तात्पर्य है ।
Tuesday, 26 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
समुद्र तट पर भगवान राम के समक्ष पार जाने को लेकर दो मत सामने आते हैं । समस्या यह थी कि समुद्र को कैसे पार किया जाय ? उसे पार करने का एक उपाय तो विभीषण बताते हैं । वे कहते हैं कि समुद्र से प्रार्थना कीजिए । और दूसरा उपाय श्रीराम के अनुज लक्ष्मणजी सुझाते हैं कि प्रभु ! आपके बाण में अपार शक्ति है, धनुष और बाण चढ़ाइये और समुद्र को सुखा दीजिए । पर अन्त में जब समुद्र सामने आता है, तो वह भगवान से अनुरोध करता है कि प्रभो, यदि आप सुखाकर चले जाएँगे, तो उससे आपका चमत्कार तो प्रकट हो जाएगा, पर आपके अवतार का उद्देश्य केवल महिमा प्रगट करना तो है नहीं, आपका उद्देश्य हर व्यक्ति को ऐसा प्रशस्त पथ देना है, साधना की ऐसी क्रमिक पद्धति देनी है, जिससे हर व्यक्ति उस सत्य तक पहुँच सके, जिस तक कोई बिरले ही महापुरुष छलाँग लगाकर पहुँच पाते हैं । अतः अनगिनत बन्दरों को साथ लेकर चलने का मार्ग तो सेतु का ही मार्ग हो सकता है ।
Monday, 25 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान के अवतार का उद्देश्य क्या है ? अकेले व्यक्ति की साधना का सत्य तो ऐसा हो सकता है कि वह ऐसी अतुलनीय सामर्थ्य रखता हो कि एक ही छलाँग में परमार्थ को प्राप्त कर ले, पर यदि उसे हजारों लोगों को साथ लेकर चलना हो, तो यदि वह व्यक्ति छलाँग मार्ग से अपने पराक्रम का प्रदर्शन करे तो इसमें उसकी महिमा तो दिखाई देगी, पर बेचारे अन्य चलने वाले लोग उस गति के साथ चलने में असमर्थ हो जाएँगे । इसलिए महापुरुष जब चलते हैं, तो अपनी चाल से नहीं चलते ! जिन लोगों को लेकर चलना है, उनकी जितनी क्षमता है, उसके अनुकूल चलते हैं । स्वयं भगवान राम का जो मार्ग है, वह पैदल मार्ग है और सारे बन्दरों को साथ लेकर चलने का मार्ग है ।
Sunday, 24 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
......कल का शेष.....
लेकिन कुछ पात्रों के जीवन में सीढ़ी का मार्ग नहीं दिखाई देता । किन्हीं पात्रों के जीवन में हमें ऐसा दिखाई देता है, जिसे हम छलाँग का मार्ग कह सकते हैं । छलाँग का मार्ग कहने का अभिप्राय यह है कि कुछ लोग ऐसे विलक्षण होते हैं, जो सीढ़ी की क्रमिक साधना से न चलकर, ऐसी छलाँग लगाते हैं कि एक छलाँग में ही वे ऊपर दिखाई देने लगते हैं । यदि हम बालि और सुग्रीव के चरित्र की तुलना करें, तो हम यही कहेंगे कि सुग्रीव के चरित्र में तो क्रमिक विकास है, वे सीढ़ी के मार्ग से ऊपर चढ़ते हैं, पर बालि के चरित्र में विशेषता यह है कि प्रारंभ में तो वह एकदम नीचे दिखाई देता है, पर जब उसने छलाँग लगाई, तो एक बार में ही वह इतना ऊपर पहुँच जाता है जहाँ तक पहुँचने में सुग्रीव को काफी समय लग जाता, परन्तु ध्यान रहे, यह छलाँग वाला मार्ग कोई ऐसा मार्ग नहीं है, जिसके लिए किसी को उत्साहित करना उचित हो । वस्तुतः मार्ग का जब वर्णन किया जाएगा, तो सोपानवाले मार्ग का ही वर्णन होगा । परन्तु आप इतिहास को उठाकर पढ़िए, पुराणों को पढ़िए, मानस के पात्रों को देखिए, तो पाएँगे कि कुछ ऐसे भी पात्र अवश्य हैं, जिनके जीवन में छलाँग है ।
Saturday, 23 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
ऐसा लगता है कि बालि और सुग्रीव में से प्रभु ने सुग्रीव को अधिक महत्व दिया । भगवान राम ने उन्हें मित्र के रूप में स्वीकार किया और बालि के ऊपर बाण का प्रहार किया । पर यदि आध्यात्मिक सत्य की दृष्टि से विचार करके देखें, तो दोनों के चरित्र में आपको एक अनोखा अन्तर दिखाई देगा । उस अनोखे अन्तर के लिए मैं एक शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा कि एक मार्ग तो वह है, जिसमें सीढ़ियाँ होती हैं, यह साधना के क्रमिक विकास का मार्ग है । जैसे आप ऊपर की ओर चढ़ना चाहते हैं, तो पहले सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं और उन सीढ़ियों के माध्यम से एक के बाद दूसरी सीढ़ी पर पैर रखते हुए व्यक्ति ऊपर उठता है । इसी प्रकार साधना में धीरे-धीरे आगे बढ़ने के लिए सोपान बनाए जाते हैं, किन्तु यह सीढ़ी वाला मार्ग कोई बहुत सरल मार्ग नहीं होता । इसमें थोड़ा-सी असावधानी से नीचे गिरने का डर बना रहता है । जो इन सीढ़ियों पर चढ़ता है, वह बड़ी सावधानी से पैर रखता है और अन्त में इन सीढ़ियों के माध्यम से वह ऊपर पहुँच जाता है ।
.......शेष कल....
.......शेष कल....
Friday, 22 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
मानस में बालि निन्दनीय है या वन्दनीय ? वह अच्छा पात्र है या बुरा ? सामान्यतः हमारे मन में यही धारणा आती है कि बालि बुरा पात्र है और इसकी पुष्टि इस बात से हो जाती है कि भगवान ने बालि पर बाण से प्रहार किया । केवल प्रहार ही नहीं, बल्कि कठोर-से-कठोर शब्दों में उसकी भर्त्सना भी की, उस पर अनेक आरोप लगाए । उन आरोपों से तो यही लगता है कि बालि निन्दनीय पात्र है । लेकिन अंगद का परिचय जब भी दिया गया, बालितनय के रूप में दिया गया, पर एक भी प्रसंग ऐसा नहीं है, जहाँ उन्हें बालितनय कहकर उन पर कटाक्ष किया गया हो या उसके निन्दनीय पक्ष की ओर संकेत किया गया हो । बालितनय कहकर सदा उनकी प्रशंसा की गई और यह शब्द प्रभु को इतना प्रिय था कि जब वे अंगद को कुछ कहना चाहते थे, तो वे उन्हें अंगद की जगह बड़े स्नेह से बालितनय ही कहते थे । अंगद की प्रशंसा के हर प्रसंग में जब उनका स्मरण बालि के पुत्र के रूप में किया गया, तो इसमें आध्यात्मिक साधना का बड़ा ही सार्थक संकेत है ।
Thursday, 21 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
मानस में अंगद के सन्दर्भ में जितनी भी पंक्तियाँ आई हैं, उन सबमें यह बात आपको स्पष्ट दिखेगी कि अंगद के लिए जिस शब्द का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है, वह है 'बालितनय' । यह बात अपने आप में कुछ विचित्र-सी प्रतीत होती है, क्योंकि परंपरा यह है कि जब हम किसी व्यक्ति का स्मरण किसी प्रसंग में करते हैं, तो यदि उसकी निन्दा या आलोचना करनी हो तो उसका संबंध हम ऐसे व्यक्ति से जोड़ते हैं, जो बुरा हो और जब किसी व्यक्ति की प्रशंसा करना चाहते हैं, तो उसका संबंध किसी श्रेष्ठ व्यक्ति से जोड़ते हैं । मानस में भी इसी पद्धति का प्रयोग किया गया है । ऐसी स्थिति में बालितनय के रूप में अंगद का परिचय दिया जाना, एक प्रश्न उपस्थित करता है कि बालितनय कहना अंगद की प्रशंसा है या निन्दा ? इसका उत्तर जानने के लिए हमें बालि के चरित्र पर विचार करना होगा ।
Wednesday, 20 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी के लिए राम एक प्रतीक नहीं हैं, 'मिथ' नहीं हैं, माध्यम नहीं हैं । वे तो उनके आराध्य हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की विजय गाथा का मानस में वर्णन करते हैं तो संसार के व्यक्तियों या राजाओं की 'जय' से वे इसे भिन्न रूप में देखते हैं । संसार में एक व्यक्ति या एक राजा की विजय का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति या राजा की पराजय । पर भगवान राम की विजय का अर्थ दूसरे की पराजय न होकर सबकी विजय है । श्रीराम की जय में सबकी जय है ।
Tuesday, 19 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गीता में स्थितप्रज्ञ और सन्त दोनों के लक्षणों का वर्णन किया गया है । आपको सन्तत्व और स्थितप्रज्ञता में एक सूक्ष्म अन्तर मिलेगा । स्थितप्रज्ञ वह है कि जिसकी प्रज्ञा (बुद्धि) प्रत्येक स्थिति में स्थिर है । जो किसी भी घटना से विचलित नहीं होता, वह स्थितप्रज्ञ है । पर रामचरितमानस में सन्त का लक्षण बताया गया कि सन्त वह है कि जो दूसरे के दुख में दुखी हो जाता है । यद्यपि पढ़कर तो यही लगता है कि इन दोनों में परस्पर विरोध है । क्योंकि जो सन्त होगा वह स्थितप्रज्ञ नहीं होगा और जो स्थितप्रज्ञ होगा वह सन्त नहीं होगा । पर भगवान राम के व्यक्तित्व में बड़े अद्भुत रूप में दोनों का सामंजस्य विद्यमान है, तथा दोनों की ही सार्थकता है । और इस सूत्र को हमें समझ लेना चाहिए । हम अपनी पीड़ा, अपने दुख में स्थितप्रज्ञ बनें इसमें तो शोभा है । लेकिन अगर हम दूसरों की पीड़ा के समय भी स्थितप्रज्ञ बन जायँ, तो क्या यह स्थितप्रज्ञता कही जायेगी ?
Monday, 18 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
जब नारद को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने निर्णय किया कि मैं भगवान के पास बैकुंठ चलूँगा, तब भगवान नारद को बीच रास्ते में रोक देते हैं, कि नारद ! सही लक्ष्य तक पहुँचने की इच्छा ही यथेष्ट नहीं है, इसके साथ-साथ व्यक्ति के जीवन में सही मार्ग की भी आवश्यकता है । मुझे लगता है कि तुम्हारा लक्ष्य बुरा नहीं है, पर तुम मार्ग से भटक गये हो । इसके पश्चात भगवान देवर्षि नारद से वार्तालाप करके उनको वहीं से लौटा देते हैं । इसका अभिप्राय है कि जीवन में किसी भी व्यक्ति का लक्ष्य बुरा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुख पाना चाहता है, शान्ति पाना चाहता है, परमानन्द पाना चाहता है । इसमें तो कोई भेद नहीं है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए जिन साधनों का हम प्रयोग करते हैं उनसे अगर सुख के स्थान पर दुख का अनुभव हो रहा है तो इसका अर्थ हमें यही लेना चाहिए कि शायद हम सही मार्ग पर नहीं हैं और इस बात का हमें अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि इतना विलम्ब लगने पर भी अगर हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पा रहे हैं तो हमारा कर्तव्य है कि किसी मार्ग के विशेषज्ञ महापुरुष के चरणों का आश्रय लेकर हम उनसे पूछें कि मेरे लिए उपयुक्त मार्ग कौन-सा है ? यह कृपा करके बताइए ।
Sunday, 17 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
इन्द्र का अंश होने के नाते बालि के जीवन में वे सारे दोष विद्यमान थे, जो पुण्य तथा सत्कर्म के साथ जुड़े हुए हैं । लेकिन बालि ने उन दोषों को मिटाकर अपने जीवन में ज्ञान और भक्ति का चरम फल पाया, ज्ञान के द्वारा मुक्ति का और अंगद के समर्पण के माध्यम से जो महानतम कार्य बालि के द्वारा हुआ, वह भक्ति का फल पाया । भगवान बालि से बोले कि तुम जीवित रहो और सेवा करो । बालि ने कहा कि महाराज, मैं इस अभिमानी शरीर से सेवा नहीं करूँगा । इस देह से मुझे अब मुक्ति दें । तब ? यह मेरा पुत्र अंगद मेरा ही रूप है, मेरे ही समान बली है, इसे रख लीजिए । और इसके साथ बालि ने एक शब्द और जोड़ दिया कि मेरा पुत्र मेरे ही समान बलवान तो है, पर एक अन्तर है, मुझमें बल के साथ अभिमान था और इसमें बल के साथ विनय है ।
Saturday, 16 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
जिन तत्वों के कारण देवताओं की निन्दा और प्रशंसा की गई है, वे ही तत्व इन्द्र के अंश से जन्मे बालि में भी है । अभिमान तथा प्रदर्शन की वृत्ति के कारण ही वह रावण से युद्ध कर उसे पराजित करता है और उसे बगल में दबाए हुए सारे संसार में घूमता रहता है । क्या उसे ब्रह्मा की बात याद नहीं थी कि भगवान अवतार लेंगे ? बिल्कुल याद थी । रामायण में आप पढ़ते हैं कि तारा के रोकने पर बालि ने कहा था कि राम साक्षात भगवान हैं । इसका अर्थ है कि बालि को पता था कि भगवान अवतार लेंगे । लेकिन भगवान के अवतार के पहले ही रावण को हराने में भी उसकी वही अभिमान की वृत्ति थी कि ब्रह्माजी ने कहा है कि श्रीराम के साथ जाकर रावण को हराना, पर यदि मैं श्रीराम के साथ जाकर रावण को हरा भी दूँगा, तो कीर्ति तो राम की ही होगी, हमें कोई विजेता मानेगा नहीं । दूसरी ओर भगवान अपनी कीर्ति को बाँटने के लिए इतने व्यग्र हैं कि युद्ध समाप्त होते ही वे बन्दरों से कहते हैं कि तुम्हारे बल से ही मैं रावण को मार सका ।
Friday, 15 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रावण से युद्ध के समय जब इन्द्र ने भगवान श्रीराम के पास अपना रथ भेजा, तो स्वयं भेजा, प्रभु ने नहीं मँगाया । उन्हें रथ की क्या ज़रूरत ? पर जब इन्द्र ने भेजा, तो प्रभु ने उसे स्वीकार किया । यही है उनकी महानता और साधना का भी यही सत्य है । आपके लिए यदि कोई समय पर सवारी न भेजकर बाद में भेजे, तो आप बिगड़कर कहेंगे कि ले जाओ अपनी गाड़ी, हमें नहीं चाहिए । लेकिन जब इन्द्र का रथ आया, तो आवश्यकता न होते हुए भी भगवान ने उसे स्वीकार किया । यह नहीं कहा कि ले जाओ अपना रथ, हमें नहीं चाहिए । भगवान तो प्रसन्न होकर बोले कि यह रथ क्या इन्द्र ने भेजा है ? स्वागत है । और वे उस रथ पर बैठ गए । भगवान का अभिप्राय मानो यह था कि भाई, सत्कर्म में कुछ-न-कुछ कमियाँ तो रहती ही हैं, पर उसका यह अर्थ नहीं कि उस पुण्य या सत्कर्म का, उस सेवा का हम तिरस्कार करें । केवल अभिमान ही तो बाधक था, यदि वह हट गया, तो ये जितने सत्कर्म और सद्गुण हैं, उन्हें जीवन में स्वीकार करना चाहिए । सत्कर्म में अभिमान का मिटना भी जरूरी है और अभिमानरहित सेवा को स्वीकार कर उसका सदुपयोग करना भी अपेक्षित है ।
Thursday, 14 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में इन्द्र की पूजा बन्द कराकर गिरिराज गोवर्धन की पूजा के लिए ब्रजवासियों को कहा । इन्द्र भी भगवान शंकर की तरह यह अर्थ ले सकते थे कि भगवान जिसकी पूजा करना चाहें, वह पूज्य हो जाता है, परन्तु अभिमान के कारण वे क्रोध में भरकर सारे ब्रज को नष्ट करने पर तुल गए । उन्होंने सारे मेघों को आज्ञा दी कि घोर वर्षा करके ब्रज को डुबो दो । तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण कर ब्रज की रक्षा की । भगवान ने अपनी कनिष्ठिका अँगुली पर गोवर्धन को उठाया, पर ग्वाल-बालों से कहा कि तुम लोग भी अपनी लाठियाँ और अपने-अपने हाथ लगा दो । यह साधन और कृपा का सामंजस्य है । भगवान के ऊपर विश्वास के साथ-साथ भगवान के आदेश से स्वयं भी सेवा कार्य करना ।
Wednesday, 13 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान राम ने जब रामेश्वर में भगवान शंकर की मूर्ति स्थापित करके पूजा की, तो पार्वती ने पूछा कि महाराज, रावण की पूजा लेने तो आप लंका चले जाते हैं, लेकिन भगवान राम ने पूजा की, तो आप पूजा लेने नहीं गए और उन्हें मूर्ति बनाकर पूजा करनी पड़ी । रावण चैतन्य की पूजा करता है और श्रीराम को जड़ मूर्ति की पूजा करनी पड़ी । यह क्या बात है ? शंकरजी ने हँसकर कहा कि पार्वती तुम समझी नहीं । रावण तो मुझ चैतन्य को देखकर भी चैतन्य रूप में नहीं देख पाता, लेकिन हमारे प्रभु तो इतने बड़े हैं कि वे जिस पत्थर को छू दें, वही शंकर बन जाता है । उन्हें मेरी जरूरत नहीं है, वे तो जिस कण को स्पर्श कर देंगे, वही शंकर हो जायेगा ।
Tuesday, 12 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भागवत की कथा आपने सुनी होगी - ब्रजवासी इन्द्र की पूजा किया करते थे । एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने पूछा कि यह इतनी बड़ी तैयारी किसलिए हो रही है । लोग बोले कि हम लोग इन्द्र की पूजा करते हैं, उसी की हो रही है । भगवान ने ऐसा भाषण दिया कि उन लोगों के मन में यह बात आ गई कि अब हम इन्द्र की पूजा छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा करेंगे । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूजा बन्द करा देने पर इन्द्र को बड़ा क्रोध आया, अच्छा, तो यह बालक मेरी पूजा बन्द कराकर एक पहाड़ की पूजा करा रहा है ? वेदों में तो गोवर्धन पूजा के नहीं, मेरी ही पूजा के मन्त्र हैं । इन्द्र क्रोध से उबल रहे हैं, पर भगवान तो उन पर कृपा करके उनका अभिमान दूर कर रहे थे । इन्द्र यदि भावुक होते, तो समझ जाते कि सचमुच व्यक्ति बड़ा नहीं है । भगवान पर्वत की पूजा क्यों करा रहे हैं ? वस्तुतः पूज्य तो ईश्वर हैं और वे अपने संकल्प से चाहे जिसे पूज्य बना देते हैं । व्यक्ति में अपनी पूज्यता कुछ भी नहीं होती । यदि इन्द्र में यह वृत्ति आती, तो वे धन्य हो जाते ।
Monday, 11 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रामायण में कथा आपने सुनी होगी - इन्द्र ने भगवान राम के लिए रथ कब भेजा ? जब कुम्भकर्ण मारा गया, मेघनाद मारा गया, बड़े-बड़े योद्धा मारे गए और रावण से भगवान की पहले दिन की लड़ाई समाप्त हो गई, तब कहीं जाकर इन्द्र ने रथ भेजा । इतना विलम्ब करने के पीछे इन्द्र का मनोविज्ञान क्या है ? वही अभिमान और संशय । इन दोनों से मुक्ति पाना बड़ा कठिन है । ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास हो जाए, रंचमात्र संशय न रह जाए, अभिमान न रह जाए । इसी अभिमान और संशय के कारण इन्द्र रथ भेजने में विलम्ब करते हैं । संशय क्या है ? इन्द्र स्वर्ग में बैठे निरन्तर युद्ध को देख रहे हैं । राम और रावण का युद्ध चल रहा है, पर अभी तक इन्द्र को राम की महिमा पर पूरी आस्था नहीं है । युद्ध में तरह-तरह के उतार-चढ़ाव आते देखकर इन्द्र को लगता है कि कहीं रावण ही तो नहीं जीत जाएगा ? ऐसा न हो कि हम रथ भेज दें और रावण बाद में हमारी खबर ले कि अच्छा, तुमने रथ भेजा था ? जब देख लिया कि अब तो निश्चित रूप से श्रीराम की विजय हो रही है और वे ऐसे भी जीत ही जाएँगे, तब सोचने लगे कि अब यदि रथ नहीं भेजेंगे तो कहने को हो जाएगा कि इस महान युद्ध में इन्द्र ने भगवान को कोई सहयोग नहीं दिया ।
Sunday, 10 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
इन्द्र के जितने रूप हैं, उन सबमें जो दुर्बलता पग-पग पर दिखाई देती है वह है अभिमान तथा ईर्ष्या की वृत्ति । जहाँ पर सत्कर्म है, वहाँ अभिमान की आशंका बनी रहती है और ईर्ष्या की वृत्ति ! आप अपने सत्कर्म के द्वारा किसी उच्च पद को पा लें, तो इसके साथ यह भय भी बना रहेगा कि कहीं आपको इस पद से हटना न पड़े । दूसरा भय यह कि हमारे पद पर कोई दूसरा न बैठ जाए । बेचारे इन्द्र इस भय से मुक्त नहीं हो पाते । ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं, जिनमें इन्द्र की यह दुर्बलता प्रकट होती है । यह मानो भोग, सत्ता और पद के सहज-स्वाभाविक दोष हैं, जो इन्द्र के चरित्र में दिखाई देते हैं । और इसी का प्रतिबिंब बालि के चरित्र में है ।
Saturday, 9 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
मोह का भागना और मोह का भंग होना, दोनों में पार्थक्य है । बालि के हाथों रावण की पराजय को लोगों ने बड़ा महत्व दिया । स्वाभाविक भी है, क्योंकि रावण सबको हरा देता था । पर इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि एक क्षण ऐसा भी आया जब मोह सत्कर्म के सामने पराजित हो गया । पर इसमें व्यंग्य क्या है ? बालि ने रावण को हरा तो दिया, पर मारा नहीं, अपितु उसे अपनी बगल में दबा लिया । कब तक ? छह महीने तक उसे अपने बगल में दबाए संसार की परिक्रमा करता रहा । उसका उद्देश्य क्या था ? पुण्यात्माओं में पायी जानेवाली दुर्बलता ! बालि ने मोह को परास्त करने में सफलता तो पा ली, पर उसे लगा कि मेरे इस महान विजय को तो किसी ने देखा नहीं । यदि मैं लोगों से कहूँ कि मैंने रावण को हरा दिया, तो पता नहीं लोग विश्वास करेंगे या नहीं, इसलिए बगल में प्रमाण-पत्र दबाए घूम-घूमकर दिखा रहा था कि देख लो, मैं कितना बड़ा पुण्यात्मा हूँ, मैंने बुराई को परास्त कर दिया है । उसने रावण रूपी बुराई को मिटाया नहीं, बगल में दबा लिया है और साथ ही उसका प्रदर्शन भी चल रहा है ।
Friday, 8 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
रामायण में जो कहा गया कि सारे संसार में रावण का राज्य था, तो इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि जीवनभर हम मोह के शासन में रहें और घण्टे भर के लिए मोह से मुक्त हों, तो उसे मोह का राज्य ही तो कहा जाएगा । अब आप कथा में आए हुए हैं, तो यही मानना होगा कि इस समय आप मोह से मुक्त हैं, पर प्रश्न है कि मोह मिट चुका है या दबा हुआ है ? ज्योंही हम कथा से उठकर जाते हैं, वह फिर हम पर सवार हो जाता है, भले ही वह बगल में दबा हुआ चला जाए । *"बिनु सत्संग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग"*। सत्संग में मोह भागता तो है, पर मरता नहीं । इसलिए मानस में बहुकाल शब्द भी जोड़ दिया गया । सत्संग से कुछ समय के लिए तो मोह भागेगा, पर वह न जाने कब लौट आए । दीर्घकाल तक सत्संग करने से ही मोह भंग होगा - *तबहिं होइ सब संसय भंगा । जब बहुकाल करिय सत्संगा ।।*
Thursday, 7 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
मोह को दबा लेना बड़ा कठिन भी है और सरल भी । इसी कारण रावण के सन्दर्भ में भी बड़ी अनोखी बात कही गई है । एक ओर तो यह कहा गया है कि रावण ने सारे संसार को जीत लिया है और दूसरी यह भी बात आती है कि रावण को तो बालि ने हरा दिया, सहस्त्रार्जुन ने हरा दिया । यहाँ विरोधाभास है । रावण विश्वविजेता है । इतने लोगों से हारकर तो उसे विजेता की उपाधि नहीं मिलनी चाहिए थी, पर जीवन का सत्य यही है । हमारे और आपके जीवन में भी तो कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब हम थोड़े समय के लिए लोभ छोड़ देते हैं, काम से मुक्त हो जाते हैं, क्रोध पर नियन्त्रण कर लेते हैं, मोह की वृत्ति को दबा लेते हैं । यह बात तो हर व्यक्ति के जीवन में होती है । क्या क्रोधी निरन्तर क्रोध ही करता रहता है ? क्या ऐसा कोई कामी है, जो निरन्तर काम में लिप्त रह सके ? इसका सीधा तात्पर्य यह है कि भले ही हम क्षणभर के लिए काम को हरा दें, कुछ देर के लिए लोभ पर विजय पा लें और उस क्षण को हम इतना महत्वपूर्ण समझें, तो क्या उतने से ही मान लें कि हमने तो शाश्वत विजय पाई ली । रामायण में जो कहा गया कि सारे संसार में रावण का राज्य था, तो इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि जीवनभर हम मोह के शासन में रहें और घण्टे भर के लिए मोह से मुक्त हों, तो भी उसे मोह का राज्य ही तो कहा जाएगा ।
Wednesday, 6 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
दो शैलियाँ हैं - एक तो बुराइयों को दबाने की और दूसरी बुराइयों को मिटाने की । सही पद्धति तो केवल रोग को दबाना नहीं, उसे मिटाना है । बालि के चरित्र में जो संकेत आता है कि उसने रावण को हरा तो दिया, पर उसे मिटाया नहीं । बड़ी सांकेतिक भाषा है । उसने रावण को हराकर उसे बगल में दबा लिया । यह 'दबा लेना' शब्द बड़े महत्व का है । इसका अर्थ यह है कि एक समय उसने जीवन में बुराई को दबा लिया । याद रखिए रोग या बुराई के दब जाने से निश्चिंत होने की बात नहीं है, बल्कि वह और खतरनाक है, क्योंकि रोग की अनुभूति होती रहे तो रोगी पथ्य करता है, सावधान रहता है । पर यदि वह कोई ऐसी दवा ले ले, जिससे कुछ काल के लिए पीड़ा की अनुभूति बिल्कुल ही गायब हो जाए, तब तो मनुष्य के मन में निश्चिन्तता आ जाएगी । बालि की पद्धति में सबसे दोषपूर्ण बात यह है कि वह पाप को मिटाने की नहीं, दबाने की चेष्टा करता है । बालि के समान जो पाप और मोह को दबा लेगा, उसका वही परिणाम होगा, जो आगे चलकर बालि के जीवन में दीख पड़ता है ।
Tuesday, 5 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
बन्दरों में बालि ही एक ऐसा था, जिसका व्यवहार भिन्न हुआ । वह भगवान के आने की प्रतीक्षा न करके, पहले से ही शक्ति-प्रदर्शन करने लगा । वह बड़े-बड़े वीरतापूर्ण कार्य करने लगा । आप पढ़ते हैं कि रावण और बालि में संघर्ष हुआ और बालि ने रावण को हरा दिया । मायावी राक्षस ने बालि को चुनौती दी और बालि ने उसे उसके साथियों सहित मार डाला । इसका अर्थ यह है कि बालि एक ऐसे योद्धा के रूप में आता है, जो दुर्गुण-दुर्विचारों को हराने में समर्थ है । लेकिन हम इस विजय को किस अर्थ में लें ? कुछ लोग कहते हैं कि हम जीवन में सत्कर्म करें, ईश्वर की क्या आवश्यकता है, पर मानस का दृष्टिकोण ऐसा नहीं है । कहीं ऐसा न हो जाए कि हम ईश्वर की अवहेलना करके मात्र अपने पुरुषार्थ के द्वारा दुर्गुणों के खिलाफ युद्ध करने लग जाएँ । इससे हम दुर्गुणों को दबा भले ही लें, पर उन्हें मिटा नहीं सकते । इन दोनों में अन्तर है ।
Monday, 4 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिया कि आप लोग वानर के रूप में जन्म लेकर भक्तिपूर्वक भगवान की प्रतीक्षा करें और जब वे आकर लंका पर चढ़ाई करें, तो उनके पीछे चलते हुए युद्ध करें । लंका में भगवान की विजय होगी । साधना का भी यही क्रम है । सत्कर्म में जो अभाव है, उसे दूर करने के लिए हम भगवान से प्रार्थना करें । उनकी कृपा पाने के लिए हम साधना करते हुए निरन्तर भगवान की प्रतीक्षा करते रहें । सबसे अनोखे तो हनुमानजी निकले । उन्होंने स्वयं रावण या कुम्भकर्ण से युद्ध नहीं किया । उनकी शक्ति और सामर्थ्य का वर्णन पढ़कर तो लगता है कि हनुमानजी के जैसा बलवान तो कोई था ही नहीं । पर उनके चरित्र का तत्व क्या है ? वे अपने बल का उपयोग तभी करते हैं, जब प्रभु मिल जाते हैं और जब वे उन्हें यह काम सौंपते हैं । अभिप्राय यह कि हनुमानजी भगवत्प्राप्ति के बाद भगवान के यन्त्र के रूप में, भगवान जैसी प्रेरणा देते हैं, उसी रूप में महान कार्य सम्पन्न करते हैं ।
Sunday, 3 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
ब्रह्मा ने देवताओं को यह आदेश दिया था कि आप लोग वानर के रूप में जन्म लें और सेवा-भक्ति का व्रत लेकर भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करें । सभी देवता बन्दर के रूप में जन्म लेकर भगवान के आने का मार्ग देख रहे हैं । अब यहाँ साधना का दूसरा तत्व आता है । साधना और सत्कर्म तो ठीक है, पर रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए या आध्यात्मिक भाषा में कहिए तो मोह और अभिमान को जीतने के लिए क्या केवल सत्कर्म और सद्गुण ही यथेष्ट हैं या कुछ और चाहिए ? इसका सूत्रात्मक उत्तर यह दिया गया कि हममें चाहे जितने सत्कर्म तथा पवित्र गुण हों, उन गुणों तथा सत्कर्मों को भगवान से जोड़ना आवश्यक है । अभिप्राय यह कि व्यक्ति के जीवन में साधना या पुरुषार्थ और भगवत्कृपा का सामंजस्य होना चाहिए । भगवत्कृपा के नाम पर यदि व्यक्ति साधना तथा पुरुषार्थ की ओर से निष्क्रिय हो जाय, तो उसने कृपा का दुरुपयोग किया और यदि साधना और पुरुषार्थ के अभिमान से उसने भगवान को भुला दिया, तो उसने भक्ति की अवहेलना की । इसलिए जीवन में दोनों का सामंजस्य होना चाहिए ।
Saturday, 2 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
लंका को जलाने के बाद हनुमानजी जब लौटकर प्रभु के पास आए, तो प्रभु उनकी प्रशंसा करने लगे । तब हनुमानजी ने क्या किया ? वे प्रभु के मुख की ओर देखने लगे, बारम्बार देखने लगे । प्रभु हँसकर बोले कि हनुमान ! तुम्हारी दृष्टि तो सदा मेरे चरणों पर ही रहा करती है, आज उसे छोड़कर मुख को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हो ? हनुमानजी ने कहा कि प्रभो ! आप प्रशंसा तो मुख से कर रहे हैं, इसलिए मुख को देख रहा हूँ । कैसी प्रशंसा ? बोले कि जैसी प्रशंसा नारदजी की हुई, कहीं वैसी ही प्रशंसा मेरी भी तो नहीं हो रही है ? इसलिए जरा देख लिया कि मुख पर भाव क्या हैं ? प्रभु ने पूछा, तब तो तुम्हें प्रशंसा से डर लगता होगा ? बोले कि नहीं महाराज, डर एक अर्थ में तो है और दूसरे अर्थ में नहीं भी है । क्यों ? आपने नारदजी की व्यंग्य भरी प्रशंसा कर दी थी और उनको अभिमान हो गया था । तब आपने उन्हें बन्दर बना दिया था, पर मैं तो पहले से ही बन्दर बन गया हूँ, अब कोई चिन्ता नहीं है । वे सुन्दर थे तो अभिमान के कारण बन्दर बन गए, अब आप बन्दर को सुन्दर बनाएँगे, इसलिए मैं पहले से ही बन्दर बन गया हूँ । अभिमान व्यक्ति को नीचे ले जाता है, इसलिए मैं पहले से ही ऐसे रूप में आपके सामने आ गया, जिससे नीचे गिरने के भय से मुक्त हो सकूँ ।
Friday, 1 December 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रामायण में कहा गया है कि धर्म और पुण्य से सुख मिलता है । और दूसरी ओर कहा गया है कि अनेक पुण्यों के संग्रह के बिना सन्तों का सानिध्य नहीं होता । पुण्य से सुख मिलता है और पुण्य से ही सन्त की प्राप्ति होती है । अब ऐसी स्थिति में यदि पुण्य के बदले भोग चाहते हैं, तो मूल्यवान वस्तु के बदले जो प्राप्त करना चाहिए था, वह नहीं लिया । उस पुण्य के द्वारा यदि हम सन्त का संग या भगवान की भक्ति चाहते हैं, तभी हम पुण्य का सच्चे अर्थों में सदुपयोग कर रहे हैं । इसका अभिप्राय यह है कि देवत्व का जो संकेत है, वह यह बताने के लिए है कि यह जो सत्कर्म है या जिन्हें हम देवता कहते हैं, वन्दनीय मानते हैं, पूजा करते हैं, उस पूजा के साथ-साथ जो दोष पुण्य के साथ बने रहते हैं, उनसे भी हम सावधान रहें ।
Thursday, 30 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
रावण मारा गया । देवता फूल बरसाते हुए भगवान श्रीराम को बधाई देने के लिए आए, पर वहाँ तो बड़ा विचित्र दृश्य था । भगवान बन्दरों से घिरे हुए बैठे उनसे विनोद कर रहे हैं । जब देवता आए, तो बन्दरों ने उन्हें भगवान के निकट पहुँचने के लिए मार्ग ही नहीं दिया । उन्हें दूर से ही खड़े होकर स्तुति करनी पड़ी । अद्भुत दृश्य है ! देवता तो भगवान से दूर हैं और बन्दर बिल्कुल पास में बैठे हुए हैं । उस समय देवता जो स्तुति करते हैं, उसमें एक वाक्य आता है, देवता भगवान से कहते हैं - प्रभो ! हमारे देव-शरीर को धिक्कार है । भगवान बोले कि क्यों ? देवता बोले कि महाराज ! आपकी भक्ति के बिना अभी भी हम लोग भोग में डूबे हुए हैं, इसलिए हमें धिक्कार है । पर इसके साथ अगले वाक्य में उन्होंने अपने ही दूसरे रूप की प्रशंसा करते हुए यह भी कहा कि महाराज ! धन्य तो ये वानर हैं, जो आपके समीप बैठे हुए प्रेमपूर्वक आपके मुख को निरख रहे हैं और हम दूर खड़े हुए हैं । मानो अपने ही एक रूप की स्तुति कर रहे हैं और दूसरे रूप की निन्दा । वानर के रूप में देवता ही हैं । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि भोगी भगवान तक पहुँचकर भी उनसे दूर है और जो भगवान की सेवा में संलग्न हैं, वे उनके अत्यंत निकट हैं ।
Wednesday, 29 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
देवताओं के प्रार्थना से भगवान प्रसन्न होकर कहते हैं कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । तब ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि भगवान ने तो तुमसे कह दिया कि हम तुम्हारे लिए मनुष्य बनेंगे, पर तुम बताओ कि तुम क्या बनोगे ? देवताओं ने कहा कि महाराज ! क्या हम लोगों को भी कुछ बनना पड़ेगा ? ब्रह्मा ने कहा कि समस्या ईश्वर की नहीं, तुम्हारी है, अतः जब ईश्वर नर बन रहा है, तो तुम कम-से-कम वानर तो बनो, तभी ठीक-ठीक मिलन होगा । ब्रह्माजी बड़ा सूत्रात्मक आदेश देते हुए कहते हैं कि बन्दर बनोगे तो पूरे बन्दर ही न हो जाना । बन्दर दोषयुक्त तो है ही, वह बड़ा कामी और भोगी होता है । ब्रह्माजी ने कहा कि स्वर्ग से नीचे उतरो, भोगों का परित्याग करो, वानर शरीर धारण करो और भगवान के चरणों की भक्ति-सेवा करो । इसका अभिप्राय यह है कि पुण्य का उपयोग भोग में नहीं, भक्ति में करो । इस प्रकार ईश्वर जब नर बने, तब वे विविध देवता बन्दरों के रूप में आते हैं ।
Tuesday, 28 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान के रावण वध की घोषणा सुनकर देवता जब शीघ्रता से स्वर्ग की चलने लगे तब ब्रह्माजी ने देवताओं को वापस बुलाया । ब्रह्मा विवेक के देवता हैं । वे देवताओं से बोले कि आप लोग इतने उतावले होकर कहाँ भाग रहे हो ? देवता बोले कि महाराज, अब तो हम लोग निश्चिंत हो गए, क्योंकि भगवान ने तो कह ही दिया है कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । ब्रह्मा ने कहा - तुम लोगों ने ध्यान से नहीं सुना । क्या ? भगवान केवल इतना भी तो कह सकते थे कि हम रावण को मार देंगे, मिटा देंगे, परन्तु उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा । रावण को मिटा देना भगवान के लिए कोई प्रयत्नजन्य कार्य थोड़े ही है । वे तो केवल संकल्प मात्र से ही रावण तथा समस्त राक्षसों को मिटा सकते हैं, परन्तु उन्होंने यह जो कहा कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । तुमने उनकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया । भगवान ने यह अवश्य कहा कि हम तुम्हारी समस्या का समाधान करेंगे, पर उसमें उन्होंने एक वाक्य और जोड़ दिया है, तुम्हारे लिए हम नर का वेश धारण करेंगे । इसका अर्थ यह है कि उन्होंने रावण का विनाश ईश्वरीय पद्धति से न करके मानवीय पद्धति से करने का निर्णय किया है । इसका अभिप्राय क्या है ? जो सिद्ध सत्य था, उसको साधन का सत्य बनाने के लिए ही भगवान नर रूप लेने वाले थे ।
Monday, 27 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
देवत्व में अपनी असमर्थता का भान होने पर वे तत्काल ब्रह्मा के साथ मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं और तब आकाशवाणी होती है । इससे बढ़कर साधना का उत्कृष्ट फल और क्या हो सकता है कि किसी की साधना से, प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान अवतार लेने की घोषणा करें । यह देवत्व का बड़ा उज्ज्वल पक्ष है, देवत्व का जो दुर्बल पक्ष है, वह भी समझ लेने योग्य है । उसके लिए गोस्वामीजी ने एक बड़ी सांकेतिक बात कही -
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना ।
तुरत फिरे सुर ह्रदय जुड़ाना ।।
यहाँ तुरत शब्द का अभिप्राय यह है कि वे इतने उतावलेपन से स्वर्ग की ओर जाने लगे मानो कैसे जल्दी-से-जल्दी स्वर्ग पहुँचें । इस तुरत शब्द के द्वारा गोस्वामीजी ने देवताओं की मनःस्थिति को प्रगट कर दिया कि मानो वे हड़बड़ी में हों । यही देवताओं का दुर्बल पक्ष है । इसका रहस्य क्या था ? यह कि प्रार्थना से भगवान प्रसन्न हो गए और रावण के वध करने का आश्वासन दिया । देवताओं को लगा कि भगवान ने तो कह दिया है कि वे रावण का वध करेंगे, अब हम लोग शीघ्र चलकर अप्सराओं का नृत्य देखें, विहार करें, अब हमें तो कुछ करना धरना नहीं है । इसका अर्थ है कि भगवान की पूजा के बाद भी मन भोग की ओर ही लगा हुआ है । यह जो भोग की वृत्ति है, वह इस तुरत शब्द के द्वारा व्यक्त की गयी है ।
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना ।
तुरत फिरे सुर ह्रदय जुड़ाना ।।
यहाँ तुरत शब्द का अभिप्राय यह है कि वे इतने उतावलेपन से स्वर्ग की ओर जाने लगे मानो कैसे जल्दी-से-जल्दी स्वर्ग पहुँचें । इस तुरत शब्द के द्वारा गोस्वामीजी ने देवताओं की मनःस्थिति को प्रगट कर दिया कि मानो वे हड़बड़ी में हों । यही देवताओं का दुर्बल पक्ष है । इसका रहस्य क्या था ? यह कि प्रार्थना से भगवान प्रसन्न हो गए और रावण के वध करने का आश्वासन दिया । देवताओं को लगा कि भगवान ने तो कह दिया है कि वे रावण का वध करेंगे, अब हम लोग शीघ्र चलकर अप्सराओं का नृत्य देखें, विहार करें, अब हमें तो कुछ करना धरना नहीं है । इसका अर्थ है कि भगवान की पूजा के बाद भी मन भोग की ओर ही लगा हुआ है । यह जो भोग की वृत्ति है, वह इस तुरत शब्द के द्वारा व्यक्त की गयी है ।
Sunday, 26 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
देवता पूज्य हैं, पर पूज्यता के साथ यदि उनमें कोई कमी है, तो उसे भी बताना गीता, रामायण और भागवत का उद्देश्य है । देवता दोनों पक्षों को प्रगट करते हैं । देवत्व का वन्दनीय पक्ष तो सुन्दर है ही । जब देवताओं पर अत्याचार हुआ और व्याकुल होकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की, तो उन्होंने प्रसन्न होकर घोषणा की कि वे अवतार लेंगे । यह देवताओं का बड़ा उत्कृष्ट और प्रशंसनीय पक्ष है । इसका अभिप्राय यह है कि देवता जब यह अनुभव करता है कि हम बुराई को मिटाने में समर्थ नहीं हैं, तो अन्त में उनकी दृष्टि भगवान की ओर जाती है और यही देवता का वन्दनीय पक्ष है । देवता और दैत्य में सबसे बड़ा अन्तर यही है कि दैत्य न तो अपने आप में असमर्थता का अनुभव करता है और न ईश्वर की ओर दृष्टि डालता है, पर देवत्व में जहाँ पर अपनी असमर्थता का भान है, अपनी कमी का ज्ञान है, वहीं पर दृष्टि भगवान की ओर चली जाती है ।
Saturday, 25 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
हमारे शास्त्र बिना किसी संकोच के यह बात कह देते हैं कि पुण्य से देवत्व प्राप्त होता है, पर इसके साथ एक अन्य वाक्य भी जुड़ा हुआ है - *क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति* । आपने पुण्य के द्वारा भोग पाया, पुण्य की पूँजी समाप्त हुई और आप पुनः स्वर्ग से नोचे ओर ढकेल दिए जाएँगे । इसका अभिप्राय यह है कि यह देवत्व भी उत्थान और पतन के क्रम से मुक्त नहीं है । देवत्व वन्दनीय है, परन्तु इस अर्थ में नहीं कि उसमें कोई कमी नहीं है । देवता निन्दनीय भी हैं और प्रशंसनीय भी । हमें बस इतना ही सावधान रहना है कि जहाँ तक वे वन्दनीय हैं, हम उनकी वन्दना करें, यह नहीं कि कहीं पर देवता की निन्दा कर दी गई, तो हम उनकी पूजा करना ही बन्द कर दें ।
Friday, 24 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
इन्द्र आदि देवता वन्दनीय हैं या निन्दनीय ? इसका उत्तर यह है कि मानस में इन्द्र आदि देवताओं की प्रशंसा भी की गई है और निन्दा भी । देवता वन्दनीय क्यों हैं ? क्योंकि हमारी मान्यता है कि जो पुण्यात्मा होते हैं, वे देवत्व को प्राप्त होते हैं । जो विश्व का श्रेष्ठतम पुण्यात्मा है, वे ही अपने समय में इन्द्र-पद को प्राप्त होते हैं । इसका तात्पर्य है कि देवत्व पुण्य का परिणाम है और इन्द्र-पद पुण्य की पराकाष्ठा का परिणाम है । ऐसी स्थिति में पुण्य के साथ कुछ दोष भी होते हैं या नहीं ? पुण्य में भी कुछ कमियाँ होती हैं या नहीं ? बड़ी सीधी-सी बात है - जब कहा जाता है कि पुण्य से देवत्व प्राप्त होता है और उसके बाद स्वर्ग का जो वर्णन किया गया है, उसमें विस्तार से यही तो बताया है कि स्वर्ग में कितनी प्रचुर मात्रा में भोग सुलभ है, तो यह सब बताने का क्या अभिप्राय है ? पुण्य के द्वारा व्यक्ति देवत्व को पाकर भले ही स्वर्ग के प्रचुर भोग प्राप्त कर ले, पर वस्तुतः देवत्व के द्वारा वह भोग को ही तो जीवन का लक्ष्य बनाए हुए है । मर्त्यलोक में भोग के स्थान पर वह कोई उत्कृष्ट कर्म करके देवलोक में जाकर स्वर्ग के भोगों को भोगना चाहता है । ऐसी स्थिति में पुण्य चाहे जितना ऊँचा हो, उसमें भोग की वृत्ति छिपी हुई है और भोग के साथ जो समस्याएँ जुड़ी हुई हैं, वे स्वर्ग में भी आए बिना नहीं रहेंगी ।
Thursday, 23 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गुण-दोष का वर्णन केवल अपने गुण और दूसरों के दोष देखने के लिए नहीं किया गया है, वह तो अपने ही जीवन में दोषों का त्याग और गुणों का संग्रह करने के लिए है । हमारे जीवन में तो उल्टा ही हो जाता है । दूसरों के दोष देखकर हम उनसे घृणा करने लग जाते हैं, उनकी निन्दा करने लग जाते हैं । इसका अर्थ यह है कि इस विषय में हमारी दृष्टि भ्रान्त है, हम दूसरों का दोष देखते हैं, व्यक्ति को दोषी देखते हैं, पर यह नहीं देखते कि दूसरों का दोष-दर्शन करते हुए, निन्दा करते हुए हम स्वयं भी दोषों में लिपटे हुए हैं । वैसे ही हम गुणों की प्रशंसा तो बहुत करते हैं, पर गुणों को जीवन में लाने की चेष्टा नहीं करते । मानस का तात्पर्य है कि जब हम किसी का गुण देखते हैं, तो उद्देश्य केवल उन गुणों की प्रशंसा करना नहीं है, उद्देश्य तो उन गुणों को जीवन में लाना है । इसी प्रकार जब किसी पात्र के दोषों का वर्णन किया जाता है, तब उसका उद्देश्य भी यही रहता है कि यदि हमारे जीवन में दोष हों तो उसका परित्याग कर देना चाहिए ।
Wednesday, 22 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
निन्दा और प्रशंसा दो प्रकार से की जाती है । एक तरह की निन्दा- प्रशंसा तो की जाती है - द्वेष-राग या आसक्तिवश । जिसके प्रति आपका राग है, उसकी आप प्रशंसा करते हैं और वैसे ही जिसके प्रति हमारे मन में द्वेष या विरोध की भावना है, उसकी हम निन्दा करते हैं, परन्तु हमारी परम्परा के जो महान ग्रन्थ हैं, इनमें जो निन्दा और प्रशंसा है, वह वस्तुतः व्यक्तिपरक नहीं है । मानस में गोस्वामीजी ने कई प्रसंगों में लिखा है कि गुण-दोष मिथ्या है, पर जब उन्होंने सन्त के गुण और असन्तों के दोषों का वर्णन किया, तो किसी ने कहा, महाराज, यह तो आपकी बात स्वयं अपने आप कट गई; एक ओर तो आप गुण-दोष का भेद ही मिथ्या बताते हैं और दूसरी ओर आप इतने विस्तारपूर्वक गुणों और दोषों का वर्णन करते हैं । ऐसा क्यों ? गोस्वामीजी कहते हैं - वस्तुतः ये जो गुण-दोष बताए गए हैं, उसका उद्देश्य यह है कि गुण को जानकर हम अपने जीवन में उसे ग्रहण करें, उनका संग्रह करें और दोषों को जानकर उसका परित्याग करें ।
Tuesday, 21 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
मानस में दो प्रकार के पात्र हैं - बड़े उच्च चरित्र वाले सिद्ध पात्र और अंगद के समान ऐसे पात्र, जो विषय-पारायण हैं । उनके जीवन में साधना और उसके बाद सिद्धि आती है । अंगद का चरित्र सर्वप्रथम किष्किन्धाकाण्ड में उस समय समाने आता है, जब भगवान श्रीराघवेन्द्र बालि के ऊपर बाण चलाते हैं । और बालि गिर जाता है, प्रभु आकर बालि के सामने खड़े हो जाते हैं । बालि भगवान को कुछ उलाहने देता है और कुछ प्रश्न करता है । भगवान बड़े कठोर शब्दों में बालि की भर्त्सना करते हैं और इसकी अन्तिम परिणति यह होती है कि बालि में सहसा एक परिवर्तन आता है तथा अपनी धृष्टता के लिए उनसे क्षमा माँगता है, भगवान की दया एवं करुणा की दुहाई देता है और तब भगवान की करुणा का रुप सामने आता है । भगवान बालि के मस्तक पर हाथ रख प्रस्ताव करते हैं कि वह जीवित रहे । परन्तु बालि बड़ी विनम्रतापूर्वक इस पुरस्कार को अस्वीकार कर देता है । बालि ने सोचा कि इस समय तो शरीर को त्यागने में ही धन्यता है । लेकिन इसके साथ-साथ बालि ने भगवान से कहा - प्रभो, एक रूप में तो मैं आपके धाम में जाकर मुक्ति के आनंद का अनुभव करुँगा, परन्तु दूसरे रूप में सेवा का सुख भी पाना चाहता हूँ । इस तरह बालि ने अन्तिम क्षणों में ज्ञान और भक्ति - दोनों का सुख पा लिया । ज्ञान की चरम परिणति है मुक्ति और भक्ति का चरम लक्ष्य है - भगवान की सेवा ।बालि जीवन के अन्तिम क्षण में अपने पुत्र अंगद को बुलाकर उसे भगवान राम के हाथ में सौंप देता है और भगवान राम अंगद को स्वीकार करते हैं । यह मानस में आने वाला अंगद का पहला चित्र है ।
Monday, 20 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी 'विनय पत्रिका' में एक पद में भगवान की उदारता का वर्णन करते हुए कहते हैं - प्रभु राम के सिवाय अन्य किस स्वामी की ऐसी रीती है, जो अपने विरद के लिए पवित्र जीवों को छोड़कर पामरों से प्रेम करता हो ? गोस्वामीजी एक-एक घटना को गिनाते हुए बताते हैं कि कृष्णावतार में राक्षसी पूतना अपने स्तनों में विष लगाकर उन्हें मारने गई थी, पर उन्होंने उसे माता जैसी गति प्रदान की; काम-मोहित गोपियों पर अतुलित कृपा की; जगत के ब्रह्मा ने भी आपकी चरण-धूलि ग्रहण की; जो शिशुपाल प्रतिदिन नियमपूर्वक गिन-गिनकर गालियाँ देता था, आपने उसे राज्यसभा के भीतर ही स्वयं में विलिन कर लिया, मूढ़ व्याध ने मृग समझकर आपके चरणों में तीर मारा, उसे भी आपने अपनी दयालुता की आदत के अनुसार सशरीर अपने लोक में भेज दिया । इस प्रकार पुरातन काल के बड़े पात्रों के नाम गिनाने के बाद अन्त में इस पद की समाप्ति वे अपने नाम से करते हैं - प्रत्यक्ष पापों के पुंज तुलसीदास को भी जिन्होंने अपनी शरण में रख लिया ।इस पद में लम्बे कथानक को सुनकर कोई व्यक्ति पूछ सकता है कि ये पात्र तो बड़े पुराने युग के हैं, हम इनसे परिचित नहीं हैं; तब वे स्वयं को और हम सभी को आश्वासन देते हुए तत्काल याद दिलाते हैं कि अन्य लोगों में तो पाप और पुण्य दोनों रहे होंगे, पर आप लोग मेरी ओर दृष्टि डालिए, वे कहते हैं - मैं तो साक्षात पातक-पुँज ही था, पर मुझ जैसे व्यक्ति ने भी प्रभु की कृपा प्राप्त कर ली, तो किसी व्यक्ति को निराश होने की आवश्यकता नहीं है ।
Sunday, 19 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
अंगद के प्रारंभिक चरित्र में कुछ कमियाँ हैं और वे उन कमियों को दूर करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं । ऊँचे चरित्रों को पढ़कर या सुनकर प्रसन्नता और आनन्द की अनुभूति तो होती है, परन्तु उसमें एक यह भय लगा रहता है कि इतनी ऊँचाई तो हमारे जीवन में नहीं है । इतने उत्कृष्ट विचार, इतनी उत्कृष्ट भावना तो हमारे जीवन में नहीं है । साधक के जीवन में इससे एक प्रकार की निराशा सी आ सकती है कि वह इन विशेषताओं को अपने जीवन में ला पाने समर्थ नहीं है । लेकिन जब हम ऐसे पात्रों के विषय में पढ़ते या सुनते हैं, जिनके चरित्र में हमारे ही समान अनेक त्रुटियाँ और कमियाँ विद्यमान हैं, परन्तु वे धीरे-धीरे इन कमियों से मुक्त होते हैं, तब इसके द्वारा हम लोगों को भी यह आश्वासन मिलता है कि निराश होने की कोई बात नहीं है ; जिस स्थिति को इन भक्तों या पात्रों ने अपने जीवन में पाया है, उसी मार्ग पर चलकर हम भी उसे पा सकते हैं । अंगद का चरित्र ठीक इसी प्रकार का चरित्र है ।
Saturday, 18 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
मानस में कुछ चरित्र ऐसे हैं, जो साधना की दृष्टि से बड़े उपयोगी हैं और उनमें से एक है अंगद का चरित्र । अंगद के चरित्र में कुछ उत्कृष्ट गुण हैं, तो उनके साथ कुछ कमियाँ भी हैं । परन्तु उनके चरित्र की यह विशेषता है कि उसमें निरन्तर विकास होता हुआ दिखाई देता है और वे क्रमशः अपनी कमियों से ऊपर उठते हुए भक्ति की चरम स्थिति तक पहुँचने में समर्थ होते हैं । दूसरी ओर मानस में कुछ चरित्रों में उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट गुण विद्यमान हैं । वे सिद्धावस्था तथा परिपूर्णता के चरित्र होते हुए भी हमारे लिए वन्दनीय और आदर्श तो हैं, परन्तु साधना की उन्नति के लिए जिस क्रम की आवश्यकता है, उन चरित्रों में उनका दर्शन नहीं होता है । पर कुछ पात्र ऐसे भी हैं, जिनके चरित्र में गुण और दोष दोनों ही पक्ष विद्यमान हैं । काकभुशुण्डिजी का चरित्र भी उनमें से एक है, जिसमें साधना की दृष्टि से क्रमिक विकास दिख पड़ता है ।
Friday, 17 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
भगवान राम व्यक्ति को न तो हराना चाहते हैं और न स्वयं विजयी होना चाहते हैं । उनका संघर्ष, उनका युद्ध एक वैद्य या डाॅक्टर की तरह रोग रूपी दुर्गुणों से है, विकारों से है । रोग के विरुद्ध लड़ने वाले डॉक्टर के प्रति रोगी का कृतज्ञ होना तो स्वाभाविक ही है । इसलिए भगवान राम की जो विजय है वह सबकी विजय है । यही रामराज्य का दर्शन है । हम जीवन में बाहरी समस्याओं का समाधान तो खोजते ही हैं पर उनका स्थायी निदान खोजने के लिए हमें अपने अन्तःकरण में, अपने मानस में प्रवेश करने की आवश्यकता है । अन्तःकरण के 'पंच विकार' अनेक साधनाओं के होते हुए भी बिना भगवत्कृपा के पूरी तरह नहीं मिट पाते । गोस्वामीजी यह कहकर व्यक्ति को सचेत करते हैं कि हमारे अन्तःकरण में ये जो पाँच विकार भरे हुए हैं उन्हें पलटकर उन पात्रों में हम प्रभु के गुणों को भरकर रखें ।
Thursday, 16 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
परशुरामजी भगवान राम को एक आखिरी कसौटी पर कसना चाहते हैं । वे समझ गए थे कि नवीन अवतार मेरे सामने खड़े हैं । पर वे अपने सन्देह को मिटाने के लिए एक परीक्षा लेना चाहते हैं । उनके पास एक विष्णुजी का धनुष था जिसे वे इतने दिनों तक धारण किए हुए थे । उन्होंने उस धनुष को आगे बढ़ाते हुए भगवान राम से कहा - तुम इस धनुष को लो और इसे चढ़ा दो तो मैं समझ लूँगा कि विष्णु का अवतार हो गया है और फिर मैं अपनी भूमिका समाप्त कर दूँगा । पर आश्चर्य ! भगवान राम ने उस धनुष को लेने के लिए अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया ! क्यों नहीं बढ़ाया ! अगले ही क्षण इसका उत्तर भी मिल गया । धनुष स्वयं ही परशुरामजी के हाथ से निकलकर भगवान राम के पास चला गया । बड़ी सांकेतिक भाषा है । नेता का अर्थ है - नेय मान - जो अपनी ओर खींच ले, अपनी विशेषताओं के कारण । परशुरामजी का तात्पर्य था कि नये अवतार, नये नेतृत्वदाता नेता का यदि आगमन हो गया है तो वह गुण को अपनी ओर खींच ले । पर भगवान राम के द्वारा हाथ आगे नहीं बढ़ाए जाने के पीछे यही तात्पर्य है कि प्रयासपूर्वक, श्रमपूर्वक अपनी ओर खींचने की चेष्टा में तो श्रम करना पड़ेगा, थकान होगी, पकड़ ढीली होते ही प्रत्यंचा फिर अपने स्थान पर वापस आ जाएगी । अतः प्रयासपूर्वक खींचने की नहीं, स्वयं गुण ही जिसके पास खिंचे चले आएँ, ऐसे नेता की आवश्यकता है ।
Wednesday, 15 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
परशुरामजी भी अवतार हैं । ब्रह्म को निर्गुण कहा जाता है पर परशुरामजी ने सगुण रूप में अवतार लेकर गुणों को अपने जीवन में सचमुच स्वीकार कर लिया । वे बार-बार स्वयं कहते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ, ब्रह्मचारी हूँ, मैंने बड़े-बड़े राजाओं से युद्ध कर उन्हें हराया है । मैंने कई बार पृथ्वी को क्षत्रियों से खाली करके उसे ब्राह्मणों को दान कर दिया है । इतना ही नहीं वे विश्वामित्रजी से भी यही कहते हैं कि इन राजकुमारों को मेरे शौर्य और विजय का इतिहास सुनाओ । पर भगवान राम ऐसा कुछ नहीं कहते । भगवान राम ने कहा - महाराज ! मैं तो अपने आपको आपसे तुलना के योग्य नहीं मानता । आप महान हैं, प्रणम्य हैं और मैं तो बस आपके चरणों में ही प्रणाम कर सकता हूँ । परशुरामजी ने कहा - इन बातों से काम नहीं चलेगा, तुम्हें लड़ना ही पड़ेगा । भगवान राम बोले - महाराज ! लड़ने से क्या होगा ? - एक जीतेगा, दूसरा हारेगा, परशुरामजी बोले । भगवान राम बोले - हार-जीत की ही बात है तब तो मैं पहले ही स्वीकार करता हूँ कि मैं सभी प्रकार से आपसे हारा हुआ हूँ । भगवान राम दूसरों को हराने में विश्वास नहीं करते । इस प्रकार वे हार स्वीकार करके भी जीत जाते हैं ।
Tuesday, 14 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
जनकपुर में परशुरामजी विश्वामित्रजी से मिलते हैं । दोनों में बड़ा स्नेह है । विश्वामित्रजी ने श्रीराम और लक्ष्मण को आगे किया और दोनों भाइयों से परशुरामजी को साष्टांग प्रणाम करवाया । परशुरामजी को दोनों अच्छे लगे । उन्होंने उन्हें आर्शीवाद दिया । पर भगवान राम से वे इतने प्रभावित हुए कि एकटक देखने लगे । जनकजी ने देखा कि आज परशुरामजी शान्त-प्रसन्न दिख रहे हैं । सोचने लगे कि कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहा है । पर उसी समय परशुरामजी अचानक सोचने लगे कि मैं किस चक्कर में पड़ गया । क्या मैं रूप-सौंदर्य देखने आया था ? मुझे तो धनुष देखना है । और तब उनकी दृष्टि चली गई खण्डित धनुष पर । और तब उन्हें क्रोध आ गया । गोस्वामीजी ने इन शब्दों से एक बहुत बड़ी बात कह दी । वे कहते हैं कि अखण्ड ज्ञानघन भगवान राम को जब तक परशुरामजी देख रहे थे परम प्रसन्न थे, पर जब उनकी दृष्टि 'अखण्ड' से हटकर खण्डित धनुष पर चली गई तो उन्हें क्रोध आ गया । यही व्यक्ति, समाज और हमारे-आपके जीवन का सत्य है । अखण्ड को देखने से क्रोध शान्त होता है पर खण्ड को - चाहे वह देश, प्रान्त, जाति किसी रूप में क्यों न हो, देखकर क्रोध आना स्वाभाविक ही है । भेद और विभाजन ही क्रोध के मूल में है ।
Monday, 13 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी धनुष-भंग प्रसंग में उस समय के राजाओं की मनःस्थिति का एक व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि जिस समय परशुरामजी आए तो उपस्थित सब राजा, जो भगवान राम से युद्ध करना चाहते थे, आतंकित हो गए । पर जब परशुरामजी ने यह पूछा कि धनुष किसने तोड़ा है ? तो यह सुनकर उन्होंने चैन की साँस ली । बात यह थी कि जब ये राजा धनुष तोड़ने के लिए चलते थे तो इष्टदेव से प्रार्थना करते थे कि धनुष हमसे तुड़वा दीजिए । पर जब उनसे धनुष नहीं टूट पाता तो वे लौटकर अपने-अपने इष्टदेवों को उलाहना देते थे कि मैंने आपकी पूजा-प्रार्थना की और आपने यह फल दिया । उन्हें बड़ा दुख होता था । और जब धनुष भगवान राम के हाथों टूट गया तो वे राजा अत्यधिक दुखी हो गए कि हमसे धनुष टूटा नहीं और एक छोटी अवस्था के राजकुमार ने तोड़ दिया । इस प्रकार वे सब राजा अपने-अपने इष्ट देवताओं से बहुत नाराज थे । पर जब परशुरामजी ने पूछा तो सभी राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपने-अपने इष्ट देवों को धन्यवाद देने लगे कि आपने अच्छा किया जो हमसे धनुष नहीं तुड़वाया ! यदि तुड़वा दिया होता तो आज हमारा सिर अवश्य ही कट गया होता ! यही मनुष्य का स्वभाव है । अच्छे-बुरे की परिभाषा उसके स्वार्थ के अनुसार बदलती रहती है ।
Sunday, 12 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
जनकपुर की सभा में गोस्वामीजी भगवान राम और परशुरामजी महाराज दोनों की उपस्थिति का जो वर्णन करते हैं उसमें एक विलक्षणता दिखाई देती है । दोनों ही अवतार हैं । दोनों ही प्रकाशमय हैं । परशुरामजी जब आते हैं तो गोस्वामीजी लिखते हैं कि भृगुकुल के सूर्य आए । और भगवान राम जब धनुष तोड़ने के लिए खड़े हुए तो गोस्वामीजी उनको भी सूर्य बताते हैं । परशुरामजी सूर्य हैं और भगवान राम भी सूर्य हैं, पर दोनों सूर्यों में एक भिन्नता है । सूर्य में प्रकाश है और ताप भी है । शीतकाल में हम बड़ी आतुरता से सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं कि कब सूर्य निकले जिससे हमारी शीत की पीड़ा का निवारण हो । पर जेठ की दुपहरी में जब सूर्य का प्रकाश और ताप सबसे अधिक होता है, तब हम उसका स्वागत करने के स्थान पर उससे भयभीत हो जाते हैं और प्रयास करते हैं कि इस सूर्य से दूर किसी अँधेरे स्थान पर छिपकर अपने आपको बचावें ! इसका अभिप्राय है कि सूर्य जब प्रकाश देता है, शीत का निवारण करता है, तब वह हमारे लिए प्रिय हो जाता है पर जब वह हमें तप्त करने लगता है तो हमारे लिए भय का कारण बन जाता है । इसी प्रकार भगवान राम और परशुरामजी, दोनों ही सूर्य हैं पर अन्तर यही है कि परशुरामजी जेठ की दुपहरी वाले सूर्य हैं और भगवान राम शरद्कालीन प्रातःकाल के सूर्य हैं ।
Saturday, 11 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
जब भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा कि मैंने निर्णय किया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, मूर्ख सुग्रीव का भी वध उसी बाण से कर दूँगा । सुनकर लक्ष्मणजी ने प्रभु से कहा - महाराज ! यह कार्य आप मुझे करने दीजिए । जब बड़े भाई ने अपराध किया तो आपने दण्ड दिया, अब छोटे भाई के अपराध का दण्ड छोटा भाई दे, यही उचित होगा । लक्ष्मणजी धनुष-बाण चढ़ाकर चलने लगे । तब भगवान राम ने उनका हाथ पकड़ लिया और समझाने लगे - लक्ष्मण ! ऐसा न हो कि कहीं जाकर उसे मार ही डालो ! - प्रभु आप ही ऐसा कह रहे थे ! प्रभु बोले - मेरा उद्देश्य उसे मारना नहीं था, बस उसे डराना था । वह भय के मारे मेरा भक्त बना था । बालि के मरने से उसका भय जाता रहा, इसलिए वह मुझे भूल गया । अतः उसे मारना नहीं है । तुम जाकर उसे थोड़ा-सा भय दिखा दो, वह पुनः मेरा भक्त बन जायेगा । लक्ष्मणजी ने कहा - मैं आपकी बात ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ पर आपका आदेश है तो जाकर उसे डराता हूँ । लक्ष्मणजी चलने लगे तो प्रभु ने फिर कहा - लक्ष्मण ! एक बात और याद रखना । वह जितना बड़ा डरपोक है उतना ही बड़ा 'भगोड़ा' भी है । अतः तुम उसे इस ढंग से डराना कि वह भागकर कहीं दूर न चला जाय, इधर ही आए । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम के भय के पीछे भी उनकी कृपा दिखाई देती है ।
Friday, 10 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
मानस में वर्णन आता है कि सुग्रीव राज्य प्राप्त करने के बाद आमोद-प्रमोद में इतना डूब गए कि 'श्रीसीताजी का पता लगाना है' इस बात का उन्हें स्मरण ही नहीं रहा । प्रभु ने उस समय क्रोध का बहुत बढ़िया अभिनय किया । प्रभु बोले - लक्ष्मण ! देख रहे हो न ! सुग्रीव राजपाट पाकर मुझे भुल गया । अतः मैंने निर्णय किया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, मूर्ख सुग्रीव का भी वध उसी बाण से कल कर दूँगा । सुनकर लक्ष्मणजी को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरी भाषा बोलने का अभ्यास प्रभु को है नहीं ! फिर प्रसन्नता हुई कि बहुत अच्छा है कि प्रभु को क्रोध तो आया ! पर एक बात उन्हें अच्छी नहीं लगी कि 'प्रभु कल मारुँगा' क्यों कह रहे हैं ? क्या हमें सुग्रीव को मारने के लिए कोई सेना इकठ्ठी करनी है ? पर इस कल शब्द से ही भगवान राम के चरित्र की विशेषता प्रगट होती है । मानो वे बताना चाहते हैं कि यदि क्रोध आ जाय तो उसकी प्रतिक्रिया के रूप में जो कार्य करना चाहते हैं उसे तुरन्त ही क्रियान्वित न करके 'कल' पर टाल दीजिए ।
Thursday, 9 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
मानस में कहा गया है कि भगवान राम की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं । इसका संक्षेप में सूत्र यही है कि हमारी सफलता का अर्थ है, दूसरे की असफलता और हमारी विजय का अर्थ है दूसरी की पराजय । सृष्टि में यह द्वन्द समाज में दिखाई देता है । इसीलिए समाज में अधिकांशतः जो दुख दिखाई देता है वह अभावजन्य न होकर ईर्ष्याजन्य है कि हमसे अधिक हमारे पड़ोसी के पास क्यों है । हमारे चिन्तन की दिशा ठीक नहीं है । हम यह मानकर चलते हैं कि दूसरों का दुख, दूसरों का अभाव ही हमारा सुख है, हमारी सम्पन्नता है । इस चिन्तन में परिवर्तन की आवश्यकता है । भगवान राम बन पाना यद्यपि हमारे लिए सम्भव नहीं है पर उस चिन्तन का एक बिन्दु भी हमारे जीवन में आ सके तो जीवन धन्य हो सकता है ।
Wednesday, 8 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान राम के चरित्र की विशिष्टता के सन्दर्भ में महाराज दशरथ गुरु वसिष्ठ से जो वाक्य कहते हैं वह बड़े महत्व का है । महाराज दशरथ के मन में जब यह बात आई कि श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त करें, तो वे गुरु वसिष्ठ के पास गए और कहा कि मैं यह दावा नहीं करता कि मेरे विरोधी नहीं हैं, शत्रुता का भाव रखनेवाले नहीं हैं । वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति हैं जो मुझसे प्रेम करते हैं, मित्रता रखते हैं । कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो वैर-विरोध रखते हैं और कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो न तो मित्रता ही रखते हैं और न ही विरोध करते हैं । पर मैंने एक बात अनुभव किया है कि जहाँ तक राम का संबंध है वे सभी राम से उतना ही प्रेम करते हैं जितना प्रेम मैं करता हूँ । यह गुण मुझमें नहीं है, जो राम में है । मानस में यह भी कहा गया कि 'बैरिहु राम बड़ाई करिही' भगवान राम की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं ।
Tuesday, 7 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी के लिए राम एक प्रतीक नहीं हैं, 'मिथ' नहीं हैं, माध्यम नहीं हैं । वे तो उनके आराध्य हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की विजय गाथा का मानस में वर्णन करते हैं तो संसार के व्यक्तियों या राजाओं की 'जय' से वे इसे भिन्न रूप में देखते हैं । संसार में एक व्यक्ति या एक राजा की विजय का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति या राजा की पराजय । पर भगवान राम की विजय का अर्थ दूसरे की पराजय न होकर सबकी विजय है । श्रीराम की जय में सबकी जय है ।
Monday, 6 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
कई बार लोग कह देते हैं कि जगत् के कल्याण के लिए गोस्वामीजी ने भगवान राम के चरित्र का वर्णन किया । पर यह बात मुझे ठीक नहीं लगती । जैसा कि साधारणतया मान लिया जाता है कि किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोई एक माध्यम का आश्रय लिया जाता है उसी प्रकार से श्रीराम उनके लिए एक माध्यम नहीं हैं । उन्होंने लोक-कल्याण की बात कहने के उद्देश्य से भगवान राम को माध्यम बनाया, ऐसी बात नहीं है । वे यह मानकर भगवान राम के विषय में नहीं लिखते कि यह समाज के लिए उपादेय होगा । इसे हम इस तरह कह सकते हैं कि उनका लिखना एक बाध्यता है । भगवान राम से उनका एक अटूट नाता है । गोस्वामीजी से लोग पूछते थे कि तुम बता सकते हो कि तुम्हारे भीतर राम की भक्ति कब से आई ! गोस्वामीजी विनय-पत्रिका में कहते हैं कि तुलसी तुम्हारा राम से परिचय नया नहीं है, जन्म-जन्मान्तर से तुम केवल राम के हो । राम के विषय में ही तुम कुछ कह सकते हो, अन्य के विषय में कुछ कह नहीं सकते ।
Sunday, 5 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
किसी ने गोस्वामीजी से पूछा कि आपने भी जब सरस्वतीजी को बुलाया तो उनके आने पर उन्हें स्नान कराया या नहीं ? उनकी थकान मिटाई या नहीं ? गोस्वामीजी ने कहा कि मैंने ब्रह्मलोक की सरस्वती को बुलाने का साहस ही नहीं किया । गोस्वामीजी ने एक और सरस्वती का परिचय देते हुए कहा कि मैंने एक दूसरी सरस्वती को बुलाया जो 'काठ की पुतली' हैं और जिनका निवास भगवान राम के पास है । वे कहते हैं कि यह सरस्वती चेतन न होकर एक कठपुतली है, जिसके सूत्रधार प्रभु ही हैं । वे ही इसे नचाते हैं । प्रभु जिस पर कृपा कर देते हैं उसके ह्रदय में प्रभु इस सरस्वती को नचाते हैं । और वह कवि बन जाता है । वस्तुतः कवि की वाणी पर यह जो काव्य होता है, वह सरस्वती का नृत्य ही तो है । गोस्वामीजी से पूछा गया कि आपने भगवान राम के द्वारा संचालित-नियंत्रित 'कठपुतली' सरस्वती को ही क्यों बुलाया ? ब्रह्मलोक की सरस्वती को बुलाते ! गोस्वामीजी ने कहा कि संसार में जितने नाचनेवाले हैं, या ब्रह्मलोक की सरस्वती है, वे सब नाचते हैं तो नाचते-नाचते थक जाते हैं । पर एकमात्र 'कठपुतली' का नृत्य ही ऐसा होता है जिसमें नाचनेवाली कठपुतली नहीं थकती, अपितु उसे नचानेवाला थकता है । मानो वे इसके द्वारा संकेत देते हैं कि कवि के रूप में दिखाई देने पर भी असली कवि तो प्रभु ही हैं ।
Saturday, 4 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी ने मानस के प्रारंभ में सरस्वतीजी का स्मरण किया । सरस्वतीजी को हम विद्या और काव्य की देवी मानते हैं । और जब कोई उनकी वन्दना करता है, स्मरण करता है तो वे ब्रह्मा के लोक को छोड़कर, उतावली हो दौड़ी चली आती हैं । गोस्वामीजी बड़ी मीठी बात कहते हैं कि जब सरस्वती इतनी दूर से दौड़कर आती हैं तो स्वाभाविक रूप से उनमें थकान आ जाएगी । और ऐसी स्थिति में यदि उनसे सीधे कह दिया जाय कि आप कविता बनाने के काम में लग जाइए तो यह तो बड़ी अभद्रता होगी । क्योंकि हमारे निमन्त्रण पर आने वाले सामान्य अतिथि से भी हम ऐसा व्यवहार नहीं करते । हम पहले उसकी थकान मिटाने तथा भोजन आदि की व्यवस्था करते हैं और तब उससे काम की बात करते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि सरस्वतीजी को भी पहले विश्राम तो दीजिए और इसके लिए उन्हें स्नान कराइए - रामचरित्र के सरोवर में स्नान कराने से उनकी थकान मिट जाएगी । सरस्वतीजी भी मानो ईश्वर के गुणानुवाद से, ईश्वर की वंदना से काव्य का प्रणयन प्रारंभ करती हैं । पर कुछ लोग ऐसा नहीं करते । वे भगवान राम का स्मरण नहीं करते और सीधे ही कविता बनाने का कार्य सरस्वतीजी को सौंप देते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि मैं उस रचना को कविता नहीं मानता ।
Friday, 3 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
प्राचीनकाल में यह परंपरा थी कि काव्य या किसी ग्रन्थ के निर्माण से पूर्व मंगलाचरण के रूप में देवताओं की स्तुति की जाती थी । कई लोगों को लगता है कि यह तो व्यर्थ की बात है । देवताओं की वन्दना नहीं करेंगे तो क्या ग्रन्थ पूरा नहीं होगा ? क्या इसके बिना अच्छे ग्रन्थ की रचना नहीं होगी ? तो इसका उत्तर तो यही है कि हाँ ! हो सकती है ! पर वन्दना की आवश्यकता के पीछे जो भाव है वह दूसरा है । जब हम किसी देवता की वन्दना करते हैं, स्तुति करते हैं तो हम उससे शक्ति चाहते हैं कि जिससे हम उस ग्रन्थ का निर्माण कर सकें ! और इस प्रकार उस रचना के पीछे हम अपनी शक्ति न देखकर देवता की शक्ति को देखते हैं । और तब हमारे मन में रचनाकार के अहं के स्थान पर देवता के प्रति कृतज्ञता का भाव जागृत होता है । हम अहंकार से बच जाते हैं ।
Thursday, 2 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
पुराणों में ब्रह्माजी को सृष्टि का निर्माता माना जाता है । परन्तु गोस्वामीजी अपनी साहित्यिक शैली में दर्शन की बड़ी ऊँची बात कह देते हैं । वे कहते हैं कि जनकपुर में भगवान राम और श्री सीताजी का विवाह हो रहा है । उस विवाह को देखने के लिए ब्रह्माजी, भगवान शंकर और अन्य सभी देवतागण आए हुए हैं । ब्रह्माजी यह सोचकर कि यह विवाह मेरे द्वारा बनाए गए संसार में संपन्न हो रहा है । एक गौरव की अनुभूति हो रही है । पर जब वे जनकपुर पहुँचकर चारों ओर देखने लगे तो उन्हें एक भी वस्तु अपनी बनाई हुई नहीं दिखी । वे बड़े आश्चर्य में पड़ गए । पर अब वे किससे कहें ? भगवान शंकर उनकी समस्या समझ गए । ब्रह्माजी बुद्धि के देवता हैं और शंकरजी मूर्तिमान 'विश्वास' हैं । इसका संकेत यही है कि जब बुद्धि भ्रमित हो गई तब विश्वास बोल पड़ा । और यह सूत्र है कि जहाँ समाधान बुद्धि से न मिले, वहाँ विश्वास का आश्रय लेना चाहिए । भगवान शंकर ने सीधे ब्रह्माजी को कोई उपदेश नहीं दिया । वे कहते हैं कि यहाँ केवल आँखों से देखने की वस्तु नहीं है, यहाँ ह्रदय से विचार करने की आवश्यकता है । क्योंकि यहाँ किसी संसारी स्त्री-पुरुष का विवाह नहीं, श्री सीता-राम का विवाह हो रहा है । मानो शंकर जी का ब्रह्माजी को यह बड़ा मधुर संकेत था कि हे महान रचियता ! आप संसार के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध हैं यह ठीक है । पर इस विवाह में आकर आप यह मत खोजिए कि मैंने क्या बनाया है ! यहाँ तो आप यह ढूँढ़िए कि आपको किसने बनाया है ।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
'अनादित्व' ही रामायण का मूल दर्शन है । भगवान शंकर रचियता होने का कोई दावा नहीं करते । हम सब गोस्वामीजी को 'मानस' का रचियता भले ही मानते हों पर वे कहते हैं कि जो कथा मैंने अपने गुरुजी के द्वारा सुनी उसे ही भाषाबद्ध कर रहा हूँ । वे भी अपने आपको रचियता नहीं मानते । बड़ी अद्भुत-सी बात है । भगवान शंकर से लेकर गोस्वामीजी तक अपने आपको निर्माता न मानकर बस एक माध्यम ही मानते हैं । पर हमारी बिडम्बना यह है कि हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमने सृजन किया है । वस्तुतः कोई व्यक्ति एक माध्यम ही होता है जिसके द्वारा कोई कृति संसार के सामने आती है ।
Tuesday, 31 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
सबसे अधिक कठिन है 'कर्तत्व-अभिमान' को छोड़ पाना । आपने मूर्तिकार से जुड़ी यह कथा सुनी होगी । किसी भविष्यवक्ता ने एक मुर्तिशिल्पी को उसकी मृत्यु-तिथि बता दी । वह मूर्तिकार बड़ा अद्भुत शिल्पी था । उसकी बनाई गई मूर्तियाँ इतनी सजीव लगती थी कि लोगों के लिए भेद कर पाना सम्भव ही नहीं होता था कि वे पत्थर की हैं या जीवित व्यक्ति ही खड़ा है । अपनी मृत्यु की तिथि से पूर्व उस अवधि में उसने अन्य कोई मूर्तियाँ न बनाकर अपनी ही बारह मूर्तियों का निर्माण किया । और उस घोषित तिथि को वह स्वयं भी उन सब मूर्तियों के बीच जाकर बैठ गया । यमराज ने अपने दूतों को भेजा । वे आए पर खाली हाथ लौट गए । यमराज ने पूछा - उस मूर्तिकार को लेकर क्यों नहीं आए ? दूतों ने कहा - महाराज ! वहाँ तो तेरह मूर्तिकार बैठे हुए हैं बिल्कुल एक-जैसे । क्या उन सबको लाना है ? यमराज ने सुना तो उनके कानों में एक मन्त्र कहा और सचमुच वह मन्त्र बड़ा प्रभावशाली सिद्ध हुआ । यमराज के दूत आए और लौटकर कहने लगे - वाह ! ऐसा उत्कृष्ट मूर्तिकार तो विश्व में आज तक पैदा ही नहीं हुआ है जिसने ऐसी दिव्य रचना की हो । अगर वह मूर्तिकार मिल जाता तो हम उसका हाथ चूम लेते । बस इतना सुनना था कि मूर्तिकार झट-से उठकर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मैं ही इसका निर्माता हूँ । यमदूतों ने मुस्कुराते हुए कहा - पकड़ में आ गए न ! अब चलो हमारे साथ । मूर्तियाँ तो जीवित रह गई, पर मूर्तिकार मर गया । यह जीवन का बहुत बड़ा सत्य है । कर्तापन का अहं सत्य नहीं, अनादित्व ही सत्य है । अनादित्व ही रामायण का मूल दर्शन है ।
Monday, 30 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
मानस में वर्णन आता है कि श्रीभरत जब भगवान राम का राज्याभिषेक करने के लिए चित्रकूट आते हैं तो अन्य विविध आवश्यक सामग्रियों के साथ-साथ सभी तीर्थों का जल भी अपने साथ लाते हैं । पर जब यह निर्णय हो गया कि श्रीभरत को अयोध्या लौटना है तो वे भगवान राम से प्रश्न करते हैं कि प्रभु ! मैं तीर्थों के जल का क्या उपयोग करूँ ? भगवान राम कहते हैं कि भरत ! तुम जाकर महर्षि अत्रि से निवेदन करो, वे ही इस जल का सदुपयोग बतायेंगे । श्रीभरत महर्षि अत्रि से पास आते हैं और महर्षि उस जल को एक कूप में स्थापित करवा देते हैं । आज भी चित्रकूट की यात्रा में जाने वाले यात्री बड़ी श्रद्धा से इस कूप के भी दर्शनार्थ जाते हैं । अत्रिजी ने जल को स्थापित करवाते हुए कहा कि जो यहाँ पर प्रेम से स्नान करेगा उसका जीवन पवित्र होगा और उसमें रामप्रेम का संचार होगा । इस कूप का नाम 'भरतकूप' होगा । पर महर्षि साथ ही एक बात कहना नहीं भूलते कि यद्यपि इसका नाम भरतकूप होगा, पर तुम्हें कोई भ्रम न हो जाए इसलिए मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहता हूँ कि यह तीर्थ तो अनादि काल से है पर लोग इसे बीच में एक समय के अन्तराल में भूल गए । अब तुम्हारे द्वारा पुनर्स्थापना से विश्व का उपकार हो गया । इसका भी संकेत यही है कि जो कुछ है 'अनादि' है । और इस 'अनादित्व' को समझ लें तो अभिमान कैसा ?
Sunday, 29 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
हमारी पौराणिक सनातन मान्यता है कि यह सृष्टिचक्र चलता रहता है । दिन, मास, वर्ष, कल्प आदि सब चक्राकार हैं । सृष्टि बनती है, उसका विकास होता है और फिर उसका विनाश होता है । पर कर्म यहीं नहीं रुकता, पुनः उसका निर्माण होता है । भगवान शंकर और पार्वतीजी इस सत्य को जानते हैं । विवाह के समय जब मुनियों ने कहा कि 'गणेशजी का पूजन कीजिए ।' वे कह सकते थे कि माता-पिता विवाह से पूर्व अपने पुत्र का पूजन कैसे कर सकते हैं ? पर वे जब गणेशजी का पूजन करना स्वीकार कर लेते हैं, वह इस तात्विक पक्ष की ही मानो एक स्वीकृति है कि जो कुछ है, वह सब पहले से ही है, अनादि है । और आप किसी काल-विशेष में उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम बनते हैं, अतः उस माध्यम को यह गर्व नहीं पालना चाहिए कि यह वस्तु मेरी है अथवा मैं इसका निर्माता हूँ, रचियता हूँ ।
Saturday, 28 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी भगवान राम के विषय में कहते हैं कि श्री राम अनादि हैं । दूसरी ओर गोस्वामीजी संसार के लिए भी यही कहते हैं कि यह जो विश्व प्रपंच है वह अनादि है । श्री राम अनादि हैं, वेद अनादि हैं, देवतागण अनादि हैं और विधि-प्रपंच अनादि हैं, तो फिर 'आदि' क्या रह गया ? इसका अर्थ यही है कि जब 'आदि' को हम सत्य मान लेते हैं, तो हम अपने जीवन में कर्तव्य के अभिमान को अपने सिर पर लाद लेते हैं ।
Friday, 27 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी ने मानस में चार घाट और उन घाटों में चार भिन्न-भिन्न वक्ताओं और श्रोताओं की परिकल्पना की । एक घाट के वक्ता हैं भगवान शंकर और श्रोता हैं पार्वतीजी । दूसरे घाट के वक्ता हैं भुशुण्डिजी जो गरुड़जी को भगवान राम की कथा सुनाते हैं । तीसरे घाट में याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज जी को कथा सुनाते हैं । और चौथे घाट पर स्वयं गोस्वामीजी अपने मन को कथा सुनाते हैं । पूछा जा सकता है कि चार घाटों में होनेवाली इस रामकथा के रचियता कौन हैं ? तो इसके विषय में यद्यपि कहा तो यही जाता है कि मानस की रचना गोस्वामीजी ने की है, पर गोस्वामीजी स्वयं ऐसा नहीं मानते । वे कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर की रचना है । किन्तु आप एक अद्भुत-सी बात पाएंगे कि जब भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते हैं तो वे कहते हैं कि पार्वती ! मैं तुम्हें वह कथा सुना रहा हूँ जिसे कागभुशुण्डि ने गरुड़ को सुनाई थी । पर जब भुशुण्डिजी गरुड़जी को सुनाते हैं तो वे कहते हैं कि यह कथा भगवान शंकर ने पार्वती जी को सुनाई थी । याज्ञवल्क्यजी भी कहते हैं कि यह उमा-शम्भु-संवाद है । पढ़कर आश्चर्य होता है कि इन चारों वक्ताओं में से कोई भी अपने आपको रचियता मानने को प्रस्तुत नहीं है । कोई भी यह दावा नहीं करता कि इस ग्रन्थ का निर्माण मेरे द्वारा हुआ । यह बड़े महत्व का सूत्र है । इसे बिना समझे भारतीय चिन्तन को ह्रदयंगम नहीं किया जा सकता है । और इसे समझने के लिए एक शब्द ऐसा है, जिसे समझना आवश्यक है । वह शब्द है - अनादि । अनादि का अर्थ है - जिसका कोई 'आदि' न हो । गोस्वामीजी इस अनादि शब्द को अनेक प्रसंगों में जोड़ देते हैं, अतः इस पर गहराई से दृष्टि डालने की आवश्यकता है ।
Thursday, 26 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
'मानस' के प्रति लोगों में जो प्रेम और आकर्षण है, मैं उसका अनुभव सदैव ही करता रहा हूँ । बरेली में कार्यक्रम कई महिने पहले से निर्धारित था । बाद में जब लोकसभा के चुनाव की तिथियाँ घोषित हुई तो कुछ ऐसा संयोग उपस्थित हो गया कि उस प्रसंग के समापन के दिन ही बरेली में मतदान की तिथि घोषित कर दी गई । आयोजकों को चिन्ता हुई कि तब तो उस दिन बहुत कम संख्या में लोग आ सकेंगे ! ऐसा सोचकर समापन की तिथि एक दिन आगे-पीछे रखने की बात उठी, तो मैंने उनसे कहा कि पूर्व निर्धारित दिन ही समापन रखा जाना चाहिए । क्योंकि वह बड़े महत्व का दिन है । लोग मतदान तो करेंगे ही, पर मैं देखना चाहता हूँ कि भगवान राम के पक्ष में कितना मतदान होता है । और सचमुच ! उस दिन बड़ा विलक्षण अनुभव हुआ ! उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक संख्या में लोग एकत्रित हुए और विशेष बात यह कि दिन में उन लोगों ने भिन्न-भिन्न उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया होगा पर भगवान राम के पक्ष में वे सब एकमत थे । अतः भगवान राम के पक्ष में जो मतदान है, वह तो सार्वजनीन है और यह तो बड़े आनन्द की बात है । क्यों न हो ! भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व ही ऐसा है ।
Wednesday, 25 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
श्री रामचरित्र का चित्रण, गोस्वामीजी ने 'ग्यान खानि अघ हानि कर' - पुण्य भूमि काशी और धर्मभूमि अयोध्या में रहकर किया । पर प्रभु की कृपालुता और करुणा प्राप्त करने के लिए वे चित्रकूट की प्रेमभूमि में बार-बार जाते थे और कोल-किरातों, वनचरों के प्रति प्रभु के प्रेम का स्मरण कर वे उस भावरस में निमग्न होकर एक नवीन चेतना प्राप्त कर लौटते थे । इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान और कर्म के साथ-साथ ईश्वर की कृपा की भी आवश्यकता है । क्योंकि ईश्वर की कृपा के बिना, ईश्वर के प्रति प्रेम के बिना जीवन में धन्यता की स्थिति नहीं आ सकती । चित्रकूट की भूमि प्रभु के निरावृत चरणों के संस्पर्श से अंकित पदचिह्नों के द्वारा व्यक्ति को प्रभु प्रेम प्रदान कर धन्य बनाती है ।
Tuesday, 24 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
काशी की जो भूमि है, वह गोस्वामीजी की कर्मभूमि है । मानस के अधिकांश भाग काशी में ही रचे गए । काशी के प्रति गोस्वामीजी के मन में बड़ी श्रद्धा है । यहीं पर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में 'मानस' की रचना करने का आदेश दिया । प्रारंभ में वे संस्कृत के श्लोकों में ग्रन्थ का निर्माण करने लगे । पर वे श्लोक लुप्त हो जाते । शंकरजी ने तब उन्हें 'भाषा' में रचना करने का आदेश दिया । काशी विद्वानों की भूमि है । शास्त्रों और अन्य विविध विधाओं के क्षेत्र में इसके पाण्डित्य की बड़ी प्रसिद्धि रही है । ऐसी दिव्य ज्ञान-गौरव से मण्डित भूमि में, भगवान शंकर के आदेश से 'मानस' की रचना हुई । किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि संस्कृत में जो दिव्य ग्रन्थ है, जैसे उनके पाठ का फल दिया गया है, क्या उस दृष्टि से आपके गाँव की भाषा में लिखे गए इस ग्रन्थ को भी लोग महत्व देंगे । गोस्वामीजी ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि यह तो भगवान शंकर और पार्वतीजी की कृपा का प्रसाद है अतः महान कल्याणप्रद है । और सचमुच आज भी लोग इसका अनुभव करते हैं । मानस की पंक्तियों को मन्त्रों से भी अधिक महत्व प्राप्त है ।
Monday, 23 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
कृपामय प्रभु ने चित्रकूट की भूमि में गोस्वामीजी को दर्शन दिया । सुन्दर बालक के रूप में तथा एक वीर शिकारी के रूप में, वे प्रभु के वहाँ दर्शन प्राप्त करते हैं । वहीं वे हनुमानजी के संकेत पर प्रभु को पहिचानते हैं और धन्य हो जाते हैं । 'विनयपत्रिका' में वे स्वयं इस बात का उल्लेख करते हैं । तुलसीदासजी ने चित्रकूट में भगवान को प्राप्त किया । यहीं उनका पुनर्जन्म होता है अतः चित्रकूट ही उनकी वास्तविक जन्मभूमि है । गोस्वामीजी भूलकर भी राजापूर का नाम नहीं लिखते । चित्रकूट ऐसी भावभूमि है जहाँ कोल-किरात, पशु-पक्षी सभी प्रभु को प्राप्त कर लेते हैं और इसीलिए तुलसी-जैसा असमर्थ भी वहाँ उनको प्राप्त कर सकता है । ऐसा दिव्य भाव गोस्वामीजी का चित्रकूट के प्रति है ।
Sunday, 22 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
हनुमानजी तुलसीदासजी से कहते हैं कि तुम भगवान की कृपा पाना चाहते हो तो तुम्हें अयोध्या में नहीं चित्रकूट के वन में जाकर रहना चाहिए । चित्रकूट अर्थात कृपा का पक्ष । यहाँ भगवान ऋषि-मुनियों के आश्रम में जाते हैं, कोल-किरातों से नाता जोड़ते हैं । अयोध्यावासी जब चित्रकूट आए तो अयोध्या और चित्रकूट की भूमि से जुड़े भावों की तुलना हो जाती है । अयोध्यावासियों को आया जानकर कोल-किरात बड़ी प्रसन्नता से उन अतिथियों के लिए कन्द-मूल-फल दोनों में भरकर ले चले और उनसे कहने लगे कि इसे आप लोग स्वीकार करें । अयोध्यावासियों का पक्ष सामने आ गया । वे विचार करते हैं कि ये बेचारे वनवासी बड़े गरीब हैं । उन्होंने सोचा होगा कि इतने धनी-समृद्ध अयोध्यावासी आए हैं तो हमारी वस्तुओं का दाम अच्छा मिलेगा । इसीलिए अयोध्यावासी उन्हें उन वस्तुओं के कई गुना दाम देने का यत्न करते हैं पर वे वनवासी उसे नहीं लेते । किसी ने उनसे पूछ दिया कि आप लोग मूल्य ले क्यों नहीं रहे हैं ? उन्होंने कहा - आप लोगों ने भगवान राम को साधना का मूल्य देकर पाया होगा, इसीलिए आप लोग मूल्य को ही महत्व देते हैं । पर हमने तो भगवान राम को बिना दाम के ही पाया है इसीलिए हम भी आपको बिना दाम ही इन वस्तुओं को दे रहे हैं ।
Saturday, 21 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
साधना और कृपा में बहुत बड़ा अन्तर है । वन-प्रसंग में जो वर्णन आता है उसमें यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है । चित्रकूट की यात्रा मानो कृपा के स्वरूप को ही प्रगट करती है । भगवान राम और केवट के बीच जो वार्तालाप होता है उससे यह ज्ञात हो जाता है कि अयोध्या की सीमा यहाँ समाप्त हो जाती है । भगवान राम के साथ केवट का जो वार्तालाप होता है, जो भाषा वहाँ सुनाई देता है वह किसी साधक की नहीं हो सकती । और यहाँ से ही प्रभु के कृपा पक्ष का श्रीगणेश करते हैं ।
Friday, 20 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
यन्त्रों के माध्यम से काम करनेवालों को असावधानी का दुखद अनुभव होते हुए दिखाई देता है । यन्त्रों के द्वारा बड़े-बड़े निर्माण होते हैं, बड़ी अच्छी-अच्छी वस्तुएँ यन्त्र के द्वारा बनाई जाती हैं । पर यदि यन्त्रों का उपयोग करनेवाला थोड़ा-सा भी असावधान हो जाय तो वह उपयोगी यन्त्र उस चालक को ही कुचल सकता है, मार सकता है । महाराज दशरथ अन्त में थोड़ा-सा असावधान हो गए । 'रामराज्य' के निर्माण का उनका संकल्प पूरा नहीं हो सका । बाद में यद्यपि अयोध्या में रामराज्य का निर्माण हुआ, पर इससे पूर्व रामराज्य की स्थापना चित्रकूट में हुई । अयोध्या में बाद में जो रामराज्य बना वह भरतजी के द्वारा बना । 'रामराज्य' का निर्माण चौदह वर्ष के लिए क्यों टल गया ? यह सचमुच एक विचारणीय प्रश्न है । इसका उत्तर साधना और कृपा में जो अन्तर है उसके द्वारा प्राप्त होता है ।
Thursday, 19 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
थोड़ा-सी असावधानी भी साधना को निष्फल कर सकती है । यही साधना की सबसे बड़ी समस्या है । किसान बड़े परिश्रम से खेत तैयार करे, बढ़िया बीज डाले और निराई करे और एक दिन जब फसल लहलहाने लगे तो जाकर सो रहे और उस समय आकर उसे पशु चर जाएँ ! अब दूसरे दिन आकर सिर पीटने से क्या लाभ ? इसी प्रकार साधना में थोड़ा-सी असावधानी से सर्वनाश हो सकता है । साधना में की गई भूल अक्षम्य है ।
Wednesday, 18 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान राम जब लक्ष्मणजी को कथा सुनाने लगे तो उन्होंने यही कहा कि प्रिय लक्ष्मण ! तुम मन, बुद्धि और चित्त लगाकर सुनो । प्रभु कह देते कि पूरे अन्तःकरण - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से सुनो ! पर उन्होंने चार में से तीन का ही नाम लिया । इसका अर्थ है कि कथा 'अहंकार' लेकर नहीं छोड़कर सुनने की आवश्यकता है । मानस-रोगों की चर्चा करते हुए गोस्वामीजी बताते हैं कि अहंकार, डमरुआ है । और जिसे यह रोग हो जाय, उसका पाचन खराब हो जाता है । इसका अर्थ यही है कि अहंकारी व्यक्ति को कथा पच नहीं सकती । वह कथा को ठीक-ठीक रूप में ग्रहण ही नहीं कर सकता । कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें कथा में आने पर अगली पंक्ति में बैठने का स्थान न मिले, अथवा उनके स्थान से उठाकर अन्यत्र बैठने को कह दिया जाय तो वे कथा में आना बन्द कर देते हैं । सोचिए, कथा का यही अर्थ है क्या ? यदि कोई अभिमान लेकर, अभिमान की पुष्टि के लिए कथा में आए तो उसकी कोई सार्थकता नहीं है । जब प्रभु की कथा सुननी है तो आगे, पीछे या बीच में जहाँ भी स्थान मिल जाय, बैठकर कथा सुनी जा सकती है ।
Tuesday, 17 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवत्कथा में ऐसा दिव्य आनन्द प्राप्त होता है, ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है कि व्यक्ति उसमें निरन्तर निमग्न रहना चाहता है । क्योंकि कथा का अर्थ मात्र इतिहास या घटनाओं का वर्णन ही नहीं है । सन्तों ने, भक्तों ने किन-किन दृष्टियों से भगवान को देखा, उनके लीला-चरित्र को किस रूप में किसने ह्रदयंगम किया, कैसे हम उस दिव्य आनन्द को पा सकते हैं ? यह सब हम कथा के द्वारा ही प्राप्त करते हैं । कथा का हमारे जीवन में गहरा प्रभाव पड़ सकता है और इसके माध्यम से हमें ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन से भी अधिक लाभ और आनन्द की प्राप्ति हो सकती है । पर इसे किस प्रकार सुनें, यह बहुत महत्वपूर्ण है । इसे केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं, सही अर्थों में ग्रहण करना यदि व्यक्ति सीख ले तो जीवन में परिवर्तन हुए बिना नहीं रहेगा ।
Monday, 16 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान राम जब अयोध्या में सिंहासनरूढ़ हो जाते हैं तो उस समय श्री भरत एवं शत्रुघ्नजी की बस एक ही दिनचर्या है । वे हनुमानजी से कहते हैं कि प्रभु अभी विश्राम कर रहे हैं इसलिए आप हमारे साथ उपवन में चलिए । वे उपवन में हनुमानजी से कथा सुनते हैं । हनुमानजी कथा कह लेते हैं तो भरतजी उनसे कहते हैं कि महाराज ! एक प्रसंग थोड़ा ठीक से स्पष्ट नहीं हुआ, कृपया फिर से कह दीजिए ! हनुमानजी फिर से सुना देते हैं । बड़ी अनोखी बात है । बहुधा यही देखा जाता है कि कथा समाप्त होने में कभी-कभी थोड़ी देरी होने लगती है तो कुछ लोग जो घड़ी को अधिक महत्व देते हैं वे बार-बार घड़ी की ओर देखने लगते हैं कि न जाने यह कथा कब तक चलेगी ? एक दूसरी स्थिति भी दिखाई देती है । कथा सुनने के बाद आप यदि वक्ता से कह दें - महाराज ! आपने जो बताया उसमें से कुछ बातें ध्यान में नहीं रहीं, आप एक बार फिर कह दीजिए । तो इसे सुनकर वक्ता बुरा मान जायेगा । पर गोस्वामीजी कहते हैं कि वहाँ तो स्थिति ही दूसरी है - श्रोता बार-बार पूछते हैं और वक्ता भी बड़े प्रेम से बार-बार सुनाते हैं । भगवत्कथा के प्रति ऐसा दिव्य अनुराग ।
Sunday, 15 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
श्री हनुमानजी जैसा न कोई श्रोता है और न ही कोई वक्ता है । रामायण में वर्णन आता है कि प्रभु जब इस लोक में लीला का संवरण कर परम धाम को पधारने लगे तो हनुमानजी से उन्होंने पूछा - क्या तुम मेरे साथ चलोगे ? तो हनुमानजी ने यही कहा कि प्रभु ! जब तक इस संसार में आपकी कथा होती रहे, उसे श्रवण करने के लिए मैं यहीं रहना चाहता हूँ । कथा के प्रति ऐसा अनुराग हनुमानजी में है । कबीरदासजी ने भी ऐसी ही बात कही है । एक दिन किसी व्यक्ति ने उनकी आँखों में आँसू देखकर पूछा - महाराज ! क्या बात है, कोई दुर्घटना हो गई क्या ? कबीरदासजी ने कहा - बैकुंठ से निमंत्रण आया है, यहाँ से जाना पड़ेगा । - महाराज ! बैकुंठ तो बड़े सौभाग्य से मिलता है फिर भी आप रो रहे हैं । तब कबीरदासजी ने कहा - सत्संग में जो सुख है, वह बैकुंठ में भी नहीं है । मानस में कथा के प्रति दिव्य प्रेम का वर्णन अनेकानेक प्रसंगों में हमें प्राप्त होता है ।
Saturday, 14 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
माँगने के सन्दर्भ में महाभारत में भी एक कथा आती है कि अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही माँगने के लिए भगवान कृष्ण के पास गए । भगवान कृष्ण ने कहा कि एक ओर मेरी एक अक्षौहिणी सेना है जो युद्ध करेगी । दूसरी ओर मैं हूँ और मैं जिधर रहूँगा, वहाँ केवल एक दृष्टा के रूप में उपस्थित रहूँगा, युद्ध बिल्कुल नहीं नहीं करुँगा । अब तुम दोनों जिसे चाहो चुन लो । भगवान कृष्ण ने फिर कहा कि अर्जुन छोटा है अतः उसे मैं पहले माँगने का अवसर देता हूँ । दुर्योधन ने जब यह सुना तो उसके पसीने छूट गए । वह सोचने लगा कि अर्जुन तो लड़ने वाली सेना ही मांगेगा और मेरे हिस्से में कृष्ण आ जाएँगे । अब मैं इन्हें लेकर क्या करूँगा ? पर जब अर्जुन ने न लड़नेवाले कृष्ण का चुनाव किया तो दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हो गया । उसने सोचा, युधिष्ठिर ने बहुत अच्छा किया जो इस मुर्ख को भेज दिया । यह केवल अर्जुन और दुर्योधन का सत्य नहीं है । हम लोगों के सामने भी यदि निष्क्रिय ईश्वर और सक्रिय संसार के बीच चुनने का अवसर आ जाय तो हम लोग भी संसार को ही चुनेंगे और चुनते हैं । भगवान को कोई नहीं लेना चाहता । हमारे जीवन का सत्य यही है ।
Friday, 13 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
जनश्रुति में यह कथा प्रचलित है कि प्रातःकालीन क्रिया से निवृत्ति के बाद लोटे में जो जल शेष रह जाता था उसे गोस्वामीजी एक बबूल के पेड़ में डाल देते थे । कहा जाता है कि उस वृक्ष में एक प्रेत रहता था । नित्य जल पाकर वह बहुत प्रसन्न हो गया और एक दिन गोस्वामीजी के सामने प्रगट होकर उसने कहा कि 'तुम कुछ चाहते हो तो मुझे बताओ ! मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने का यत्न करूँगा ।' गोस्वामीजी ने कहा कि 'मैं भगवान राम के दर्शन करना चाहता हूँ ।' भूत ने कहा कि ये तो मेरे लिए सम्भव नहीं है । मैंने भी श्रीराम के दर्शन नहीं किए हैं पर मैं उपाय बता सकता हूँ । आप इस विवाद न पड़ जाएँ कि भूत होते भी हैं या नहीं और होते हैं तो इस तरह जल डालने से वे प्रसन्न होकर प्रगट भी होते हैं या नहीं ! आप यहाँ इस सूत्र की ओर ध्यान दें जो बड़े महत्व का है और व्यक्ति को प्रेरणा देता है । संसार में अधिकांश व्यक्ति जो भगवान को मानते हैं वे बस एक ही परम्परा की दृष्टि से ही मानते हैं । क्योंकि भगवान को मानने के बाद वे उनसे वस्तुएँ ही माँगते हैं । धन-सम्पत्ति, पुत्र-पौत्र आदि की ही माँग करते हुए लोग देखे जाते हैं । अब यदि विचारपूर्वक देखें तो ये सब वस्तुएँ अल्पकालिक ही हैं, समाप्त हो जानेवाली हैं, भूत बन जानेवाली हैं । पर संसारी व्यक्ति और गोस्वामीजी में एक अन्तर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । हम जब भगवान से भी माँगते हैं तो 'भूत माँगते हैं' पर धन्य हैं गोस्वामीजी कि जिन्होंने 'भूत से भी भगवान को माँग लिया ।' यही जीवन की धन्यता है । इसका अर्थ है कि हम लोग माँगना जानते ही नहीं ।
Thursday, 12 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
आगम शास्त्र में यन्त्रों के निर्माण में त्रिकोण का बड़ा महत्व है । किसी भी देवता के यन्त्र में एक सबसे भीतर भी एक त्रिकोण होता है जिसके केन्द्र में एक बिन्दु होता है और उस केन्द्रबिन्दु में स्थित उस देवता की उपासना की परम्परा आगम शास्त्र में देखी जाती है । गोस्वामीजी के जीवन में भी हमें पुण्यभूमि - अयोध्या, काशी और चित्रकूट के रूप में एक त्रिकोण दिखाई देता है जिसके मध्य में, केन्द्रबिन्दु में भगवान श्री सीताराम का सम्मिलित स्वरूप उनके आराध्य तत्व के रूप में दिखाई देता है ।
Wednesday, 11 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी ने मन से जुड़ी समस्याओं को अपने जीवन में भोगा, झेला और फिर उनका समाधान जिस पद्धति से प्राप्त किया, उन सबका वर्णन उन्होंने 'रामचरितमानस' और 'विनयपत्रिका' आदि अपने ग्रन्थों में किया है । गोस्वामीजी जानते हैं कि व्यक्ति का 'मन' ही समस्याओं का केन्द्र है । मन जिससे जुड़ जाता है, वह उसी का रूप ग्रहण कर दुख-सुख की सृष्टि कर लेता है । वस्तुतः मन को किससे जोड़कर उसे स्वस्थ रखा जा सकता है, 'रामचरितमानस' में गोस्वामीजी इसी का संकेत अनेकानेक सूत्रों के द्वारा करते हैं । और भगवान राम के सनातन और शाश्वत चरित्र एवं कथा के माध्यम से वे मन की शाश्वत समस्याओं का समाधान प्रदान करते हैं ।
Tuesday, 10 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी के राम कभी पुराने नहीं होते । वे ईश्वर हैं तो पहले भी रहे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे । और जब राम हैं तो उनके साथ तुलसीदासजी भी हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की कथा से 'रामचरितमानस' ग्रन्थ से, मन की समस्याओं का इसीलिए समाधान देने में सक्षम हुए क्योंकि मन भी किसी देश की सीमा में बँधा हुआ नहीं है, किसी काल की सीमा में बँधा हुआ नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति के पास मन होता है । भिन्न-भिन्न काल में, भिन्न-भिन्न देशों में पैदा होनेवाले व्यक्तियों के मन का स्वरूप क्या भिन्न-भिन्न हो सकता है ? वस्तुतः मन से जुड़ी समस्याएँ और मन की प्रकृति सभी देश और काल में सदा ही उसी रूप में विद्यमान रही हैं जैसी कि आज है । अतः शाश्वत रूप में जो समस्याएँ मन के साथ सम्बद्ध है, उनका समाधान जब तक शाश्वत ईश्वर के साथ जोड़कर नहीं खोजा जाएगा, तब तक जो भी समाधान मिलेगा वह अधूरा रहेगा ।
Monday, 9 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
श्री राम को ईश्वर मानने का बहुत बड़ा लाभ है । मनुष्य मान लेने पर वे जितने सीमित हो जाते हैं, ईश्वर मान लेने पर वे उतने ही असीम हो जाते हैं । मनुष्य एक काल में होता है, एक देश में होता है । इस तरह वह देश-काल की सीमा से घिरा हुआ होता है । पर ईश्वर सदा-सर्वदा-सर्वत्र विद्यमान होता है । ईश्वर के लिए न तो काल की सीमा है और न ही देश की । गोस्वामीजी ने इसी विशेषता का आनन्द और लाभ लिया । उन्होंने कहा कि राम ईश्वर होते भी मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं और मनुष्य की भाँति आचरण करते हैं । इसमें हमें दोहरा लाभ मिलता है कि उन्हें हम मनुष्य के रूप में देखकर उनके चरित्र का अनुकरण करने का यत्न करें और जब चाहकर भी ऐसा न कर सकें, असमर्थता का अनुभव करें तो उन्हें ईश्वर के रूप में स्मरण करें और उनसे यही प्रार्थना करें कि 'प्रभु ! आप ही हमें वह शक्ति प्रदान करने की कृपा करें कि जिससे आपके आदर्शों को हम अपने जीवन में क्रियान्वित कर सकें ।
Sunday, 8 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान राम इस धरातल पर त्रेतायुग में अवतरित हुए यह एक ऐतिहासिक सत्य है । पर हम जानते हैं कि ऐतिहासिक सत्य पुराना पड़ जाता है । समय-समय पर अगणित व्यक्ति आते हैं । अपने समय में उनका नाम होता है, प्रसिद्धि होती है, सम्मान होता है पर बाद में उन्हें भुला दिया जाता है । कुछ लोग कभी-कभी उन्हें भले ही स्मरण कर लें पर जनमानस में वे प्रतिष्ठित नहीं हो पाते । किन्तु हम देखते हैं कि गोस्वामीजी के राम और स्वयं गोस्वामीजी दोनों ही जनजीवन में आज भी विद्यमान हैं और निरन्तर जनमानस को प्रेरित और अनुप्राणित करते रहे हैं । इसके मूल में यही सत्य विद्यमान है कि तुलसी के राम मनुष्य नहीं, ईश्वर हैं ।
Saturday, 7 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
'रामचरितमानस' के अन्त में रामकथा के बाद गोस्वामीजी सबको निमंत्रण देते हुए कहते हैं कि मानस की पाँच सौ चौपाइयों को जो सुनेंगे, समझेंगे और ह्रदय में धारण करेंगे तो सारी समस्या, सारे दुःखों के मूल में जो अविद्या जनित पंच विकार (अविद्या, अस्मिता, अभिनिवेश, राग और द्वेष) हैं, प्रभु राम उनको दूर करेंगे । सचमुच ये बड़े दारुण हैं और सभी समस्याएँ इन पाँचों के द्वारा ही उत्पन्न होती हैं । श्री भरतजी भी यही कहते हैं ।
Friday, 6 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
वर्णन आता है कि जब विभीषणजी आए तो सुग्रीवजी ने विरोध करते हुए कहा कि प्रभु ! यह तो रावण का भाई है, राक्षस है ! न जाने किस उद्देश्य से आया है ! बाल्मीकि रामायण में भगवान राम सुग्रीवजी से कहते हैं कि तुम इसे रावण का भाई बता रहे हो, यदि स्वयं रावण भी आ गया हो तो उसे ले आओ, मैं उसका स्वागत करने के लिए प्रस्तुत हूँ । प्रभु इतने दयालु और उदार हैं कि घोषणा कर देते हैं कि जो कोई भी मेरे सामने आ जाता है उसे साधु बनाना मेरा कार्य है । इस प्रकार सर्वत्र गोस्वामीजी प्रभु की कृपा और उनकी करुणा इन दोनों को सबसे अधिक महत्व देते हैं । इसके पीछे उनका उद्देश्य व्यक्ति को पापी और बुरा बनाना नहीं है, अपितु जो अच्छे हैं उन्हें सन्देश देते हैं कि वे निरभिमानी बनकर अपनी अच्छाइयों का उपयोग करें और दूसरी ओर दोषयुक्त व्यक्ति हैं वे भी निराश न हों ! वे प्रभु के सामने जाकर अपनी असमर्थता का, अपने दोषों का वर्णन कर प्रभु से निवेदन करें कि प्रभु ! आप हमें इनसे छुटकारा दिलवाएँ ! स्वयं को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर गोस्वामीजी, निराशा से मुक्त कर मानो, हम सबको आश्वस्त करते हैं ।
Thursday, 5 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी विनयपत्रिका के एक पद में, यह बताते हुए कि संसार में हमारे द्वारा जो कार्य किये जाते हैं वे मानो नाचने के समान हैं, कहते हैं कि जीव तो ईश्वर का अंश है पर अलग होकर वह बदल गया और अब स्थिर न रहकर निरन्तर नाच रहा है । और जैसे नर्तक अनेक रूप और वेशभूषा धारण कर पुरस्कार पाने के लिए लोगों को रिझाने की चेष्टा करता है ठीक वही स्थिति जीव की भी हो गई है । गोस्वामीजी कहते हैं कि मैं संसार को रिझाने की चेष्टा में लगा रहा और आप जिस गुण से प्रसन्न होते हैं उसे भूल गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रभु ! जब हनुमानजी की ओर देखता हूँ तो लगता है कि आप वैराग्य पर रिझते हैं । जब आप पुण्यात्माओं पर प्रसन्न होते हैं तो लगता है आप पुण्य प्रिय हैं, सद्गुण प्रिय हैं । पर जब आप सुग्रीव पर प्रसन्न हो जाते हैं और बड़े से बड़े पापी को आप अपना लेते हैं, पवित्र कर देते हैं तो फिर समझ में नहीं आता कि आप किस गुण से प्रसन्न होते हैं । इसलिए प्रभु ! मेरी तो आपसे यही प्रार्थना है कि आप अपने द्वार पर इस तुलसीदास को पड़ा रहने दें । वे जानते हैं कि 'राम के द्वार' का क्या अर्थ होता है । संसार के लोगों के भी द्वार होते हैं पर वे सबके लिए और सभी समय नहीं खुले रहते, पर एक ईश्वर का द्वार ही ऐसा है कि जो सबके लिए और सभी समय खुला रहता है ।
Wednesday, 4 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी बताते हैं कि गुणों या पुण्यों के आने पर व्यक्ति के जीवन में अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष आदि अवगुण उसके सारे सद्गुणों को खा जाते हैं । अतः व्यक्ति को चाहिए कि वह सजग भाव से अपने आपको देखता रहे । अपने आपको नित्य कसता रहे, अपनी समीक्षा करता रहे । अपने अवगुणों को पहिचाने और प्रभु के चरणों में उनसे मुक्ति हेतु निवेदन करे । इसीलिए आप गोस्वामीजी के पदों में यह बात पायेंगे कि उनका प्रारंभ निराशा से होता है पर अन्त प्रभु के प्रति चरम विश्वास से होता है । और यह मानो प्रभु की कृपा का ही फल है ।
Tuesday, 3 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी अपनी आलोचना स्वयं करते हैं । उन्हें अपने हर कार्य में कोई-न-कोई कमी दिखाई देती है । 'विनयपत्रिका' में वे कहते हैं - मनुष्य को सम्मान मिलता है तो उसे अच्छा लगता है । अपनी पूजा अच्छी लगती है तो दूसरों की पूजा हम करने लगें, यह तो ठीक है पर गोस्वामीजी अपने मन को जाँचते हुए कहते हैं कि अपनी पूजा तो अच्छी लगती है पर दूसरों का सम्मान करना अच्छा लगता ही नहीं । गोस्वामीजी आगे कहते हैं कि पापों को तो मैं छिपाता हूँ और जो-जो सत्कर्म बन गए हैं, यह दिखाने के लिए कि मैं बड़ा धर्मात्मा हूँ, सुनाता फिरता हूँ । और थोड़े बहुत जो सत्कर्म होते हैं, दम्भ उसे भीतर घुसकर बलात चुरा ले जाता है । इसका अर्थ है कि हम दम्भपूर्वक अपने पुण्यों का वर्णन करते हैं और इस प्रकार दूसरों को जलाने में इसका उपयोग कर इसे गवाँ डालते हैं ।
Monday, 2 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रामकथा का वर्णन करने के बाद भुशुण्डिजी ने गरुड़जी से पूछा कि बताएँ ! आप और क्या सुनना चाहते हैं ? गरुड़जी ने सात प्रश्न किए जिसमें उनका अन्तिम प्रश्न मानस रोग को लेकर था । बड़ा विचित्र-सा लगता है । कहाँ रामकथा की मधुरता और कहाँ मानस रोगों का वर्णन । पर इसमें यही सामंजस्य है कि यदि हम रामकथा सही ढंग से सुनेंगे तो अपने मन के रोग बहुत बड़े रूप में दिखाई देने लगेंगे और तब उन्हें दूर करने के लिए हम यत्न करेंगे ही । हम अपने आपको जिस सरलता से ऊँची स्थिति में होने का प्रमाणपत्र देते रहते हैं, हमारा वह भ्रम टूट जायेगा । अपने आप में रोग देखने के बाद कई लोग आतंकित हो जाते हैं, निराश होते देखे जाते हैं । पर यह ज्ञात होने पर कि अमुक-अमुक नियमों का पालन करने से तथा अमुक दवा लेने पर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है, रोग का जानना व्यक्ति के लिए वरदान बन सकता है । इस तरह रोग न जानना यदि अभिशाप है तो रोग को जानकर निराश हो जाना या आत्महत्या कर लेना भी उतना ही बड़ा अभिशाप है । निराश होने के स्थान पर उसे दूर करने का यत्न करना आवश्यक है । मानस-रोगों को दूर करने के लिए गोस्वामीजी ने उपाय भी बताए हैं ।
Sunday, 1 October 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
'विनयपत्रिका' में गोस्वामीजी अपने दोषों का वर्णन करते हैं तो उसे पढ़कर लगता है कि जैसे एक रोगी किसी डॉक्टर के पास जाता है और रोग के निदान के लिए डाक्टर उसके रक्त का परीक्षण करता है । अब साधारण आँखों से रक्त के कीटाणु दिखाई नहीं देते पर डाॅक्टर एक ऐसा यन्त्र सामने रख लेता है कि जिससे वह न दिखनेवाला कीटाणु कई हजार गुना बढ़े रूप में दिखाई देने लगता है । गोस्वामीजी भी इसी पद्धति से अपने दोषों को देखते हैं । और सचमुच इसी ढंग से देखने पर ही, यदि हम रोगी हैं तो, हमारे रोग के कीटाणु हमें दिखाई देंगे अन्यथा उन्हें देख पाना सम्भव नहीं है । गोस्वामीजी 'मानस-रोगों' के सन्दर्भ में एक विलक्षण बात कहते हैं कि 'मानस रोग' के कीटाणु तो हम सबके भीतर होते ही हैं । गोस्वामीजी ने इस सत्य को जीवन में समझा और उन्होंने रामायण के माध्यम से हम सबको बहुत बड़ा सन्देश दिया । इसलिए उन्होंने रामायण का समापन रामकथा से नहीं किया । उन्होंने रामायण के अन्त में 'मानस रोगों' का वर्णन किया ।
Saturday, 30 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी अपनी प्रशंसा और विरोध दोनों को समत्व में स्थिर रहकर तटस्थ भाव से देखते हैं । वे बड़ी सजगता से आत्मनिरीक्षण करते हैं और सूक्ष्मता से, गहराई से अपने आपको कसते रहते हैं । इस सन्दर्भ में महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में अहिंसा की जो परिभाषा की है, वही सूत्र, वही कसौटी गोस्वामीजी अपने संबंध में प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं । सामान्यतया यही कहा जाता है कि जो मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न दे, वह अहिंसक है । पर महर्षि पतंजलि अहिंसा को एक नया अर्थ देते हुए कहते हैं कि किसी व्यक्ति के जीवन में अहिंसा सिद्ध हो गई है इसका एक ही प्रमाणपत्र कि उसके पास जाने पर दूसरे व्यक्ति के मन के क्रोध आदि वैर-भाव पूरी तरह मिट जायँ । हम क्रोध न करें यह बात तो समझ में आती है, पर हमारे सामने आनेवाला व्यक्ति भी क्रोध न करे तब हमारी अहिंसावृत्ति पूरी है अन्यथा नहीं, यह तो अत्यंत कठिन कसौटी है । इसका तात्पर्य यही है कि हमारे जीवन में थोड़ा-सी अहिंसा की वृत्ति आ जाय तो हमें अपने अहिंसक होने का अभिमान हो जाता है । साधारणतया व्यक्ति इस कसौटी पर अपने आपको कस नहीं सकता । पर ऊँचे लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए ऐसी दृष्टि आवश्यक है ।
Friday, 29 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
विद्वानों की विशेषता कहें या कमी कहें, एक बात बहुधा उनमें पाई जाती है कि वे दूसरों के दोषों का अन्वेषण करते हैं । मुझे स्मरण आता है कि काशी विश्वविद्यालय में जब मेरा प्रवचन चल रहा था, तो मेरे द्वारा मानस की एक पंक्ति कही गई कि - *सपनेहुँ नहि देखहि परदोषा* - जो दूसरों के दोष नहीं देखता, वह भक्त है, अतः दूसरों के दोष नहीं देखने चाहिए । इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वहाँ बैठे हुए संस्कृत के एक पण्डितजी ने मेरे पास एक छोटे-से कागज के टुकड़े पर एक वाक्य लिखकर भेजा । उसमें लिखा हुआ था - 'पण्डितो दोषज्ञः' । इसका अर्थ होता है कि पण्डित वही है जो दोष को जानने वाला है । उनका संकेत यही था कि तुम कह रहे हो कि दोष नहीं देखना चाहिए पर शास्त्र कहता है कि जो दोष को जानता है वह पण्डित है । मैंने उनसे यही निवेदन किया कि यह ठीक है कि 'पण्डितो दोषज्ञः' यह शास्त्रों में लिखा है पर यह तो नहीं लिखा है कि 'अपना दोष देखनेवाले को पण्डित माना जाय कि दूसरों के दोष देखनेवाले को पण्डित माना जाय' ।
Thursday, 28 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान राम ने रावण के पास सन्देशवाहक राजदूत भेजने का विचार किया तो इस कार्य के लिए उन्होंने अंगदजी का चुनाव किया । पहली बार समुद्र के किनारे अंगदजी अकेले लंका जाने से सशंकित थे पर आज वे जरा भी सशंकित नहीं हैं । वे तो प्रभु के चरणों की कृपा के विश्वास से भरे हुए हैं । इतना ही नहीं, विश्वास की इससे बड़ी बात और क्या होगी कि रावण की भरी सभा में उन्होंने अपना पैर रोप दिया और यह प्रतिज्ञा कर दी कि रावण ! तुम या तुम्हारी सभा का कोई भी व्यक्ति मेरे पैर को उठा देगा तो मैं वचन देता हूँ कि भगवान राम लौट जाएँगे और मैं श्री सीताजी को हार जाऊँगा । बाद में बन्दरों ने अंगदजी से पूछा कि आपने इतना बड़ा दुस्साहस कैसे किया ? आपको जरा भी डर नहीं लगा । अंगदजी ने कहा कि क्या आप लोगों ने हनुमानजी की कथा नहीं सुनी थी जिसमें उन्होंने रावण से कहा था कि *राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ।।* - हनुमानजी जैसे भक्त प्रभु-चरणों के प्रभाव से जब रावण-जैसे व्यक्ति के राज्य अचल हो जाने की बात करते हैं, तो क्या प्रभु के स्मरण से मेरा पद अचल नहीं हो जायेगा । मानो हनुमानजी की कथा सुनकर अंगदजी में ऐसा प्रबल विश्वास उत्पन्न हो गया । इस प्रकार कथा के माध्यम से वे चरित्र, वे पात्र हमें कोई न कोई विचार, कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य प्रदान करते हैं । तुलसीदासजी के जीवन में भी ऐसा प्रभाव हमें दिखाई देता है ।
Wednesday, 27 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
लंकिनी ने पहले हनुमानजी को चोर कहा पर बाद में वह कहने लगी कि पहले मैं सोचती थी कि लंका का स्वामी, राजा रावण है पर अब मैं समझ गई कि इसके असली स्वामी तो भगवान राम हैं । लंकिनी सत्य को समझ लेती है जिनके सत्संग के प्रभाव से, ऐसे महान धर्मज्ञ हनुमानजी ने जब अशोकवाटिका के फल बिना रावण की आज्ञा के खा लिए, तो इसके पीछे उनका यही तत्वज्ञान था । रावण ने भी उनसे यही कहा था कि मेरी आज्ञा के बिना मेरे बाग के फल खाना तो चोरी है । तो मानो विस्तार से उत्तर देते हुए उन्होंने यही स्पष्ट किया कि यह बाग तुम्हारा नहीं है और जिनकी आज्ञा लेनी चाहिए, उनकी अनुमति से ही मैंने फल खाए हैं । हनुमानजी जानते हैं कि श्रीसीताजी प्रभु की आदिशक्ति हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया है । वे जगत् जननी हैं । माँ की आज्ञा लेकर फल खाने के पीछे उनका यही दर्शन और ज्ञान है ।
Tuesday, 26 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
अशोकवाटिका को उजाड़ने के बाद हनुमानजी जब रावण की सभा में लाए गए तो रावण से उनका प्रश्नोत्तर हुआ । उनसे रावण ने जब पूछा कि तुमने किसके बल से वाटिका उजाड़ी ? तो उन्होंने अपना भाषण प्रारंभ किया जिसे सुनकर रावण को लगा कि यह तो बड़ा विचित्र वक्ता है । मैं सीधा-सीधा प्रश्न कर रहा हूँ और यह इतने विस्तार से, इतना लम्बा-चौड़ा उत्तर दे रहा है । हनुमानजी भी सीधे-सीधे भगवान राम का नाम ले सकते थे पर उन्होंने लम्बी भूमिका के साथ अपना वक्तव्य प्रारंभ कर दिया । वे कहने लगे - "सृष्टि के मूल में जो विद्यमान है, जिनका ही बल सर्वत्र व्याप्त है, जिनका बल मेरे भीतर है और तुम्हारे अन्दर भी उन्हीं का बल है, मैं उन्हीं प्रभु का दूत हूँ ।" हनुमानजी रावण के भीतर ईश्वर की अनुभूति जागृत कर उसे प्रभु का भक्त बनाना चाहते हैं । भगवत्कथा का भी यही उद्देश्य है कि सत्संग के माध्यम से व्यक्ति को उसके स्वरूप का स्मरण हो जाय ।
Monday, 25 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
हनुमानजी कौन हैं और उनके प्रहार का क्या अर्थ है, यह बताते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि हनुमानजी प्रबल वैराग्य हैं । इसका अर्थ है कि जब व्यक्ति राग और आसक्ति के कारण सत्याचरण से वंचित हो जाता है, उस समय संत के रूप में, वैराग्य के रूप में हनुमानजी-जैसा कोई भक्त आता है जो उसकी मान्यता पर प्रहार करता है जिससे वह व्यक्ति व्याकुल हो जाता है । और यदि उसे इस व्याकुलता से सत्य का ज्ञान हो जाता है तो वह धन्य हो जाता है । पर बहुधा यही देखा जाता है बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं जो प्रहार से व्याकुल होते हैं ।
Sunday, 24 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
हनुमानजी के प्रहार से लंकिनी को अपने पुराने इतिहास की स्मृति हो आती है । उसे ब्रह्माजी के वरदान की बात याद आ जाती है । लंकिनी लंका नगर की रक्षिका है । लंका पर पहले देवताओं का अधिकार था । बाद में उस पर राक्षसों ने बलपूर्वक अधिकार कर लिया । लंकिनी रावण के संग रहकर रावण के ही चिन्तन को सत्य मानने लगी । उसने रावण की सेवा को ही अपना धर्म मान लिया । पर अब वह कहने लगी कि जब ब्रह्मा के द्वारा मुझे ज्ञात हुआ कि भविष्य में लंका पर राक्षसों का शासन होगा तो मैं दुखी हो गई । ब्रह्माजी ने मुझे दुखी देखकर सांत्वना देते हुए कहा कि यह स्थिति सदा नहीं रहेगी, उसमें परिवर्तन होगा । मैंने पूछा कि उस बदलाव का ज्ञान मुझे कैसे होगा ? तब ब्रह्माजी ने एक सूत्र दिया कि तुम कपि के प्रहार से व्याकुल हो जाओगी, तब राक्षसों का विनाश हो जाएगा । यह 'व्याकुलता' बड़ी महत्वपूर्ण है । क्योंकि समाज में या व्यक्ति में परिवर्तन तभी होगा कि जब उनमें परिवर्तन के लिए व्याकुलता उत्पन्न होगी ।
Saturday, 23 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
लंकिनी को रावण की सेवा करते-करते अपने जीवन की पूर्वगाथा का विस्मरण हो गया । कुसंग में पड़कर व्यक्ति भी बदल जाता है और उसे बुराई में दोष दिखना बन्द हो जाता है । लंकिनी ने हनुमानजी को चोर समझ लिया । हनुमानजी ने उस पर मुक्के से प्रहार किया तो कहने लगी कि बड़ा अच्छा सत्संग लाभ हुआ । आश्चर्य होता है कि हनुमानजी ने कोई उपदेश-प्रवचन तो किया नहीं, उसके सिर पर प्रहार किया ! पर इस प्रहार का लंकिनी पर विलक्षण प्रभाव पड़ा । वस्तुतः सत्संग से व्यक्ति पर प्रहार ही तो होता है । उसके चिन्तन पर प्रहार करके यही तो बताया जाता है कि यह ठीक नहीं है । उसे सत्य और सही दिशा का स्मरण कराना ही तो इसका उद्देश्य है ।
Friday, 22 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
कई बार कहा जाता है कि आजकल इतनी कथा हो रही है, इतने लोगों के द्वारा प्रचार हो रहा है, पर उससे समाज को क्या लाभ हो रहा है ? इस सन्दर्भ में एक सज्जन के पास बड़े आँकड़े थे कि सारे देश में रामायण की कितनी प्रतियाँ छपीं, कितने विद्वानों ने शोध-प्रबन्ध लिखे, कितने आयोजन किये गये और उन आयोजनों पर कितना खर्च हुआ । उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में, इतने बड़े रूप में इन प्रयासों के बाद भी समाज का कोई लाभ तो दिखाई नहीं देता । मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक एक बात कही कि कोई व्यक्ति यह पता लगाए कि इस वर्ष देश में पाँच करोड़ या इससे भी अधिक संख्या में छाते बनाए गए और फिर इस आँकड़े के आधार पर कहने लगे कि इतनी बड़ी संख्या में छाते बनने से क्या लाभ, क्योंकि वर्षा तो रुकी नहीं । तो क्या आप इस बात को बहुत बुद्धिमतापूर्ण मानकर छातों का उपयोग और निर्माण बन्द कर देंगे ? कितनी भी संख्या में छाते बना लिए जायँ, वर्षा तो होती ही रहेगी । छाते की उपयोगिता वर्षा बन्द करना नहीं, एक सीमा तक आपको वर्षा से सुरक्षा प्रदान करना है । कथा के प्रचार-प्रसार और श्रवण से यदि हम यह आशा पाल लें कि इसके द्वारा समाज में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएगा तो शायद यह हमारी अतिरंजनापूर्ण धारणा होगी ।
Thursday, 21 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
कहा जाता है कि गोस्वामीजी को पत्नी ने फटकार दिया और वे सन्त बन गए । पर यह कहना न तो न्याय-संगत है और न ही ठीक है । संसार में न जाने कितने व्यक्तियों को पारिवारिक जीवन में भर्त्सना और आलोचना सुनने को मिलती है पर वे सबके सब तुलसीदास नहीं बन जाते । तुलसीदास, तुलसीदासजी इसलिए बन गए क्योंकि उनके गुरुदेव ने बाल्यावस्था में उन्हें रामकथा सुनाकर, रामभक्ति के संस्कार, बीज रूप में उनके अन्तःकरण में डाल दिए थे । गुरुदेव ने बार-बार उन्हें जो रामकथा सुनाई - वह उनके अन्तःकरण में विद्यमान थी । उनके जीवन में ऐसा अवसर आया कि लगा कि वे वासना की, भोग की नदी में पूरी तरह डूब चुके हैं । पत्नी के प्रति वे इतने आसक्त थे कि एक दिन भी उनके बिना वे रह नहीं पाते । वे पागलों की भाँति उनके पास दौड़े चले जाते हैं जहाँ उन्हें फटकार मिलती है । उसके बाद उनमें जो परिवर्तन दिखाई देता है उसे हम पत्नी की फटकार से जोड़ देते हैं । पर वस्तुतः उस फटकार का परिणाम यह होता है कि उनके भीतर गुरुदेव से सुनी रामकथा के बीज से उसका अंकुर फुट पड़ता है । गोस्वामीजी ने जो बाल्यावस्था में सुना था, इसका बड़ा महत्व है । उससे न केवल उन्हें अपितु समाज को भी बड़ा लाभ हुआ और आज भी हो रहा है ।
Wednesday, 20 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी ने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे । बाल्यावस्था में उन्होंने अभाव, भूख, उपेक्षा, अपमान आदि की पीड़ाएँ झेलीं । ऐसा अभागा बालक शायद ही कोई और मिले जिसे जन्म के तुरन्त बाद ही इतनी विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो । फिर गुरुदेव की कृपा से वे रामकथा श्रवण का अवसर प्राप्त करते हैं । इसके पश्चात उनके जीवन में एक लालसा विवाह के रूप में आती है पर इसके बाद उनकी मनोधारा, विचारधारा एक दूसरी दिशा में मुड़ जाती है । बाल्यावस्था में संस्कार के जो बीज गुरुदेव ने डाले थे, वे मानो एक काल विशेष में काम के आकर्षण के द्वारा ढक लिए गये थे, दब गये थे, पर वे नष्ट नहीं हुए । इसे गोस्वामीजी ने सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । वे कहते हैं कि बचपन में व्यक्ति यदि तैरना सीख लेता है तो फिर वह जीवनभर उसे भूल नहीं सकता । तैराकी सिखाने की बात कही जाय तो कहा जा सकता है कि इसकी क्या आवश्यकता है ? बच्चे को क्या तैराक बनना है ? बचपन में सीखने योग्य कई अन्य संस्कारों और बातों के विषय में लोगों का यही तर्क रहता है कि इसकी आवश्यकता नहीं है । जैसे हम यह सोचकर कि 'नित्य के जीवन में तैरने का कोई उपयोग नहीं है' तैरने का बचपन में अभ्यास नहीं करते, पर यदि बचपन में तैरना सीख लें तो भले ही वह प्रतिदिन उपयोगी न हो पर संकट काल में यह कला बड़ा लाभदायी सिद्ध हो सकती है, उसी तरह बाल्यावस्था में अच्छे संस्कार के बीज हमारे अन्तःकरण में डाल दिए जायँ तो अवसर आने पर वे उदित होकर हमारी सहायता कर सकते हैं, रक्षा कर सकते हैं । गोस्वामीजी के जीवन में हमें यही सत्य प्रतिफलित होते हुए दिखाई देता है ।
Tuesday, 19 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
एक बार एक गोष्ठी में गोस्वामीजी पर विचार प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि उनकी जितनी प्रशंसा की जाय वह अल्प है । पर उनकी प्रशंसा करने वालों के साथ-साथ उनके कटु आलोचक भी हैं जिन्होंने उनकी भर्त्सना भी की है । उनमें से कई नाम भी लिये गये । मुझे भी जब बोलने का अवसर मिला तो मैंने यही कहा कि आप लोगों ने जिन व्यक्तियों का नाम लिया है, उनमें से किसी ने गोस्वामीजी की उतनी आलोचना नहीं की है जितनी स्वयं गोस्वामीजी ने अपनी निन्दा की है । और विलक्षणता यह कि उनका यह आत्मनिरीक्षण, आत्मसम्मोहन से कोसों दूर है । आत्मकथा की परम्परा है । विशिष्ट व्यक्तियों की आत्मकथाओं के द्वारा लोगों को प्रेरणा मिलती है । पर यह सम्भावना भी बनी रहती है कि आत्मकथा, आत्मप्रशंसा का रूप न ले ले । व्यक्ति आत्मकथा में अपनी विशेषताओं, महानताओं का यदि वर्णन करने लगे तो इसका अर्थ है कि वह स्वयं पर मुग्ध है, आत्मसम्मोहन की स्थिति में है । गोस्वामीजी व्यामोह से सर्वथा मुक्त हैं ।
Monday, 18 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी ने काम को भी भगवान से जोड़कर अपने आपको धन्य बना दिया । रामायण के अन्त में भगवान ने पूछा - तुलसीदास ! तुमने मेरा इतना विशाल चरित्र लिखा, बोलो क्या चाहते हो ? उन्होंने कहा - प्रभु ! अपने चरणों में प्रेम दीजिए । - कैसा प्रेम चाहते हो - भरत की तरह, लक्ष्मण की तरह, हनुमान की तरह, शत्रुघ्न की तरह, शबरी की तरह अथवा निषाद की तरह ? गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! इन नामों को लेने का अधिकारी मैं नहीं हूँ । इनमें से किसी के समान गुण मुझमें नहीं हैं । - नहीं हैं, तो फिर कैसा प्रेम चाहते हो ? प्रभु ने पूछा । तब गोस्वामीजी बोले - प्रभु !
*कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।*
*तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम ।।*
और सचमुच उन्होंने काम और लोभ को वह दिशा दे दी जो जीवन को सार्थक और धन्य बनाने वाली है ।
*कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।*
*तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम ।।*
और सचमुच उन्होंने काम और लोभ को वह दिशा दे दी जो जीवन को सार्थक और धन्य बनाने वाली है ।
Sunday, 17 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी जब यह कहते हैं कि नारी का सौंदर्य एक दीपशिखा की भाँति है तो यह नारी की निन्दा नहीं है । किस घर में अँधेरे को दूर करने के लिए दिया नहीं जलाया जाता ? क्या 'दिए' के बिना किसी घर का कार्य चल सकता है ? निन्दनीय तो वह पतंगा है जो दीपक से प्रकाश न लेकर, उस पर गिरकर स्वयं जल जाता है और कभी-कभी तो दिए को भी बुझा देता है ।
Saturday, 16 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
एक ओर तो गोस्वामीजी ममता की निन्दा करते हैं और दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि 'भगवान राम में ममता बहुत है' । वे कहते हैं कि अयोध्यावासियों पर प्रभु की बड़ी ममता है । पूछा जा सकता है कि ममता निन्दनीय है या प्रशंसनीय है ? इसका उत्तर यही है कि संसार की ममता हमें बाँधती है पर भगवान की ममता से हम बन्धन से छूट जाते हैं और भगवान बन्धन में बँध जाते हैं । ऐसी विलक्षण ममता भगवान से पाकर जीव धन्य हो जाता है । गोस्वामीजी ने इस ममता का अनुभव किया, इसलिए वे कहते हैं कि संसार के ममता के स्थान पर राम से या परोपकार से ममता जीवन को धन्य बना देती है ।
Friday, 15 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी से पूछा गया कि ज्ञान, वैराग्य और भक्ति में श्रेष्ठ कौन है ? उन्होंने कहा - भक्ति श्रेष्ठ है ! - क्यों श्रेष्ठ है ? उन्होंने एक बड़ी सुन्दर आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि माया और भक्ति दोनों ही नारी वर्ग में हैं, नारियाँ हैं । जब वे भक्ति को नारी कहते हैं, तो क्या उन्हें नारी-निन्दक मानने वाले यह मान लेंगे कि वे भक्ति के निन्दक हैं । वे कहते हैं कि ज्ञान और वैराग्य पुरुष होने के कारण माया के प्रलोभन में फँस सकते हैं, लेकिन भक्ति को प्राप्त कर लेने वाला कभी माया के मोह में नहीं फँस सकता, उस पर माया का रंचमात्र भी कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता ।
Thursday, 14 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
'मानस' में बालि और रावण दोनों के जीवन में अहंकार दिखाई देता है । दोनों की पत्नियाँ उन्हें समझाने का यत्न करती हैं क्योंकि उनकी भावना भगवान राम के प्रति बड़ी ऊँची है । पर बालि और रावण दोनों ही इनकी उपेक्षा करते हैं । इन समानताओं के साथ-साथ बालि और रावण में एक मनोवैज्ञानिक अन्तर है । मानो ये अभिमान की दो वृत्तियाँ हैं । रावण का स्वभाव है कि जो भी बात उसके सामने की जाय वह उसे काट देता है । बालि की वृत्ति दूसरे प्रकार की है । वह सामनेवाले की बात का खण्डन नहीं करता, अपितु उससे भी ऊँची बात कर देता है यह दिखाने के लिए कि मैं तुमसे ज्यादा जानता हूँ । इस खण्डन-मण्डन में साध्य एकमात्र अपने अहंकार का प्रदर्शन ही है ।
Wednesday, 13 September 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गुण और दोष के विषय में मानस में बड़ा ही तथ्यपूर्ण विश्लेषण किया गया है । पुरुष की समस्या है उसका 'मैं' और नारी की समस्या है उसकी 'ममता' । पुरुष शब्द से ही ऐसा ध्वनित होता है कि जैसे वह पुरुषार्थ और शक्ति से संबद्ध है । नारी 'गर्भ' में सन्तान को रखती है, जन्म देती है, उसके लिए अनेक कष्ट उठाती है, उसका लालन-पालन करती है, अतः स्वाभाविक रूप से उसके जीवन में ममता बहुत है । पर यदि हम 'अहं' और 'मम' इन दोनों का उपयोग सही अर्थों में करें तो ये समस्या के स्थान पर कल्याणकारी भी हो सकते हैं ।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी की पत्नी के विषय में एक विद्वान प्राध्यापक ने अपने विचार व्यक्त किए हैं । तुलसीदासजी पर उन्होंने जो ग्रन्थ लिखा है उसमें वे कहते हैं कि तुलसीदास की पत्नी बड़ी कर्कशा स्वभाव की थी इसीलिए तुलसीदासजी के जीवन में उनके प्रति विरोध की भावना उत्पन्न हो गई थी । और इसीलिए उनके ग्रन्थों में भी स्त्रियों की निन्दा और विरोध की जो बात दिखाई देती है, इसके मूल में उनकी पत्नी का स्वभाव ही एकमात्र कारण है । पर ऐसा कहना तो गोस्वामीजी के साथ न्याय नहीं है । ऐसी बात तो गोस्वामीजी को नहीं समझ पाने के कारण ही कही जा सकती है । गोस्वामीजी न तो नारी-निन्दक हैं और न ही उन्हें नारी जाति के प्रति कोई विरोध ही है । उनके ग्रन्थों में जहाँ एक ओर नारी-निन्दा के शब्द मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर नारी के संबंध में ऊँचे से ऊँचे भावपूर्ण शब्द भी मिलेंगे । सत्य तो यह है कि पुरुष हो अथवा नारी हो, दोनों में गुण और दोष दोनों ही विद्यमान होते हैं ।
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